मिनती मारडी नैसर्गिक सुंदरता से भरल जगह में रहेली. उनका घर लगे एक ओरी अजय नदी कलकल बहेला. त दोसरा ओरी कमल के फूल के पोखरा पार करम त तनिके दूर पर रेलगाड़ी के पटरी लउकी.
दुनिया में अइली त उऩका संगे रीढ़ आ गोड़ के टीबियो चल आइल. पस्चिम बंगाल के बीरभूम के माहुला गांव में रहे वाली मिनती पांच बरिस के भइली त दूर से सब कुछ देखस, बाकिर चले-फिरे से लाचार कहूं आ-जा ना सकस.
मिनती के दादी जबा मारडी इयाद करे लगली, “ओकर रीढ़ पूरा तरीका से टेढ़ हो गइल रहे. एतना कष्ट रहे कि हमनी के देख के लागत रहे अब ई ना बचिहन.”
पस्चिम बंगाल के लगभग आधा आबादी संताल लोग के बा. ऊ लोग जादे करके गांव-देहात के इलाका में रहेला आ वैद्य-हकीम पर निर्भर करेला. एह राज्य (ग्रामीण स्वास्थ्य आंकड़ा) में पीएचसी (प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र) जइसन स्वास्थ्य केंद्र के हालत खराब बा, आउर एह में डॉक्टर लोग के भारी कमी बा.
छोट मिनती के सांस लेवे में जब कठिनाई होखे लागल, त परिवार के लोग उनका मोहल्ला के वैद्य लगे ले गइल. हालांकि ऊ लोग निस्चित ना रहे कि वैद्य डिग्रीधारी बाड़न कि ना. बीरभूम जिला के एकदम पिछड़ल इलाका, सिउरी-1 ब्लॉक में ई जानलो भारी मुस्किल के बात रहे. जबा बतावेली, “हमनी के तनिको आइडिया ना रहे सही डॉक्टर कहंवा भेंटाई.”


