चदरिया झीनी रे झीनी, चदरिया झीनी रे झीनी
राम नाम रस भीनी, चदरिया झीनी रे झीनी
आठ कंवल का चरखा बनाया, पांच तत्त्व की पूनी
नौ दस मास बुनन को लागे, मूरख मैली कीनी
चदरिया झीनी रे झीनी
नेहरू दास जी की उंगलियों में एक नज़ाकत और बेदाग़ तालमेल है, जो हारमोनियम के कीबोर्ड पर चलते हुए सुरों और भावनाओं की एक जटिल बुनावट रचती हैं. उन्हें गाते हुए देखना यह कल्पना करना आसान बना देता है कि कभी यही उंगलियां उनके पिट लूम (करघे) पर कैसे नाची होंगी. हालांकि, अब उनके लिए बुनाई की तुलना में गाना अधिक स्वाभाविक हो गया है. उन्होंने यह विरासत अपने दोनों बेटों को सौंप दी है. फिर भी, वे हमें अपने गीत और अपने काम के बीच के संबंध को दिखाने के लिए उत्सुक हैं.
“जिस तरह भगवान इस शरीर को बुनने में समय लेते हैं, मां के गर्भ में शिशु को जन्म लेने में नौ महीने लगते हैं. हमारे कबीर साहब इसी बात को और कपड़ा बुनने की प्रक्रिया को आपस में जोड़कर इस संसार की सच्चाई समझाते हैं.” 70 वर्षीय नेहरू दास बधेल ख़ुद को बैगाचक का सबसे बुज़ुर्ग बुनकर बताते हैं.






















