लगे के सरकारी भट्ठी खुलल नईखे. एहीसे हमनी निजी भट्ठी के इस्तेमाल करेनी जौन 20-25 रोपया किलो पर ले लेला. सरकारी दाम 17-18 रोपया किलो बा. जे हमनी सब केहू एक हो के अधिकारी लोग से बतियाईं, त स्थिति बदल सकेला. बाकिर ईहां लोग साथ ना देला. तंजावुर में बात दोसर बा. उंहा लोग में एका बा औरी सरकार के सहयोगो बा.
हमनी के सामान- बेंटोनाईट, फायर क्ले सब दूसर राज्य से आवेला. एक टन नीमन माटी के दाम 15,000 रोपया बा. हमनी के पुतरी 30 रोपया एगो बिकाला. हमनी एकरा के कैसे सहीं? रंग कुली के दाम 200-300 रोपया 100 ग्राम बा.
हमनी पांच साल पहिले एगो एसोसियेशन सुरु कईले रहनी, बाकिर कौनो खास मदद न मिलल. सरकार कच्चा माल प सब्सिडी दे, चाहे कम दाम प मशीन दे, त इ कला बांच सकेला. एबेरा त बड़का उद्द्योग मोनाफा कमाता, छोटका मजूर लोग खाली काम के पहिया बनल बा.
एतना साल के बादो लोग हमरा बारे में पूछेला, “ओकरा का मिलल?” इ बात करेजा में लागेला.
जब सुरुआत कईले रहनी, आंध्र औरी गुजरात के बैपारी हमनी के पुतरी कीने आवे. अब, बिक्री खाली आयुध पूजा औरी नवरात्री के कोलू तेवहार के बेरा होला. बाक़ी साल सूखले रहेला. खाली अगल विलक्कु (माटी के दीया) लगातार बनत रहेला. हमनी एकरा एक रोपया में बेचेनी. इ बेसी कर के मंदिर औरी तेवहार खातिर उतर भारत में जाला.
हमनी आपन माल गोदाम में रखेनी. काहे से कि हमनी ओकरा के जमा नईखी क सकत. बिचौलिया लोग मोनाफा कमाला. हमनी मस्किल से गुजारा करेनी. जे हमनी लगे पूंजी होईत त हमनी तेवहार के बेरा ले आपन माल रखती औरी सीधे बेचतीं.
सौ मीटर के भीतरी, इंहां कम से कम 10 गो कार्यशाला बा. अधिकांश लोग तरह-तरह के गुडिया बनावेला. बाक़ी लोग दीया बनावेला. कइएक कलाकार लोग अब अगल के कार करेला- इ एगो स्थिर औरी सुरक्षित कार बा, पुतरी बनवला से. जहां एगो गलती के मतलब बा कि पूरा नोकसान. हमनियो अब आगे साल ईंहा जाए के सोचतानी.
सुमति के कहानी
हमार नाम सुमति ह. हम 15 साल से एगो छोट सिरेमिक गुडिया कंपनी चलावतानी. कब्बो गुडिया बिकाला कब्बो ना. बरखा में कुछु ना सूखेला, काम रुक जाला. हम अक्सर सोचेनी कि का हमरा अब आगे बढ़ जाए के चाहीं,
हमर बियाह मुम्बई में भईल रहे. कुछ दिन हम सूरत में रहनी. हमार मरद सराब के सौकीन रहलन. हम उनका के छोड़ के 2005 में घरे चल अयिनी. हम सिरेमिक बनावे के सिखल सुरु कईनी औरी जल्दिये एगो छोट कार्यशाला खोल लहनी. एही कार से हम अपना बेटा के पोसनी- उ अब कॉलेज में बा.