मूल रूप से पहाड़न में ऊंचाई पर स्थित वाही गांव के रहे वाला बलबीर जुलाई 2025 में गांव के बुजुर्गन के निमंत्रण पर कोटी अईलें. हरदम मांग में रहे वाला बलबीर के कहनाम बा कि देवदार के लकड़ी पर सुंदर चेहरा आ आकृति उकेरल परिवार के परम्परा हवे: “परिवार के एगो बच्चा के ई काम (नक्काशी) करे के पड़ेला. भले उ नौकरी पा के बाहर चल जाओ, ओके लौटे के पड़ेला.”
ए काम में नक्काशी से आगे के कौशल लागेला. “जे भी ई काम करेला, उ पढ़ल लिखल होखे के चाहीं,” उ कहेलन. “ओके नक्शा बनावे, मापे, काटे आ अन्य चीजन खातिर गणित के जानकारी जरूरी होखेला.”
बलबीर वाही में अपनी घर पर छव गो परिवारन में से एक से सम्बंधित हवें जे नक्काशी (लकड़ी के काम आ नक्काशी) के परम्परा के जारी रखले बा. तीन गो कारीगर उनकी संघे एइजा आईल बाड़ें सन. ई सब लोग उत्तराखंड में अनुसूचित जनजाति के रूप में सूचीबद्ध जौनसारी समुदाय से हवें.
आज नक्काशी के टीम पिलर पर पतई आ पैटर्न उकेरे के काम पर ध्यान केन्द्रित कर रहल बिया. ई गांव के लोगन के सुझावल डिजाईनन पर आधारित बा; ए क्षेत्र में मंदिरन के साझा संरचना के रूप में देखल जाला. “ई पूरा गांव के मिल्कियत हवे,” सुनील सिंह तोमर बतावेलन. “कुछ मामला में पूरा गांव मिल के एगो बड़ मंदिर बनावेला,” उ आगे कहेलन. तोमर बेसोगिलानी के राज्य स्कूल में लैब असिस्टेंट हवें आ कोटी के रहे वाला हवें.
अपनी घोषित समावेशिता के बावजूद मंदिर के स्थान स्पष्ट रूप से लिंग आ जाति के रेखा अनुसार विभाजित बा. महिला लोग के ए मंदिरन में प्रवेश ना मिलेला. पारी गांव के कई गो महिला लोगन से मिल के उनकर विचार जाने के कोशिश कईलस बाकिर केहू टिप्पणी ना कईल चाहत रहे. ई विषय वर्जित बा आ महिला लोगन के कहनाम रहे कि ओ लोगन के देवी देवता के क्रोध से डर रहे. “कुछ कारणन से महिला लोग मंदिरन में प्रवेश ना कर सकेनी,” उटेल में एगो छोट भोजनालय के मालकिन 42 बरिस के आशा देवी हमनी के बतवली. निचली जाति के समुदाय के सदस्य लोगन के कहनाम रहे कि उ लोग मंदिर में घुसे से डेरायें काहें कि ओ लोगन के अपशगुन होखे के डर रहे.