रुजलुक सु यरसुथे गोव बहनाइआंथेआंथे, एक दम ओ पाशा थई गोव हम्लाइयांथेआंथे...
वो ह आइस अऊ बहाना बनाके चले गे, वो ह मोला देखिस अऊ चले गे
वो मितान मोला बहाना बनाके छोड़ गे, वो ह मोला देखिस अऊ चले गे.



रुजलुक सु यरसुथे गोव बहनाइआंथेआंथे, एक दम ओ पाशा थई गोव हम्लाइयांथेआंथे...
वो ह आइस अऊ बहाना बनाके चले गे, वो ह मोला देखिस अऊ चले गे
वो मितान मोला बहाना बनाके छोड़ गे, वो ह मोला देखिस अऊ चले गे.
फरीद अहमद लोन अपन नजर किशनगंगा नदी मं गड़ाय हवंय अऊ धीरे-धीरे जम्मू-कश्मीर के दर्द-शिन समाज के नामी कवि गुलाम रसूल मुश्ताक के एक ठन कविता गुनगुनावत हवंय.
पार मं बइठे, हमन देख सकथन के बरफ पातर चादर कस जमे लगे हवय अऊ नान-नान परत मन बोहावत हवंय.नदी ये बखत जमे नइ ये, फेर बदलत हवय. मऊसम बदलत हवय.
कुछेक मीटर दूरिहा मं, इहाँ के माईलोगन मन जलावन लकरी अऊ कांदी के बीड़ा धरे हवंय, ये मं कुछु के वजन 25-30 किलो ले घलो जियादा हवय. एक झिन अऊ माइलोगन ह गोबर भरे तसला ला लेके जावत हवय, जेकर ले वो ह कंडा बनाय सके, जेन ह वो मन के जाड़ बखत मं चूल्हा जलाय के काम आथे. हमर तीर मं, गुरेज घाटी घूमे ला आय सैलानी मन धीरे-धीरे अपन ठीहा मं लहूटत हवंय.
फरीद बदलत मऊसम के चिन्हा डहर आरो करथे, जेन ह न सिरिफ नदी मं, फेर गुरेज मं जाड़ के तियारी मं घलो देखे बर आवत हे. दर्द-शिन समाज के एक झिन सियान फरीद कहिथे के ओकर अधिकतर लोगन मन गुरेज घाटी मं रहिथें, जिहां 37,992 दर्दिक लोगन मन रहिथें (जनगणना 2011)

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कुंवार (अक्टूबर) के लकठावत जड़कल्ला मं घाटी बरफ ले तोपा जाथे. 68 बछर के सियान फरीद कहिथे, “सिरिफ डोकरा सियान मनेच रुकथें.” बरफ सेती एक जगा ले दूसर जगा जाय नइ सकाय. “जेन मन रुकथें, वो मन अधिकतर बखत घर भीतरीच मं रहिथें.”
कभू-कभू घाटी के कुछेक जगा मन मं 15 फीट तक ले बरफ जम जाथे अऊ वो मन छै महिना तक राज के बाकी हिस्सा ले अलग-थलग रहिथें, जेकर सेती करीबन 80 फीसदी आबादी पलायन करे बर मजबूर हो जाथे. बागवानी विभाग ले रिटायर वरिष्ठ तकनीशियन कहिथें, “कुछु लोगन मन कश्मीर के दूसर इलाका मं चले जाथें. कुछु लोगन मन मजूरी करे हिमाचल प्रदेश धन पंजाब जइसने राज मं चले जाथें.” जेन मन कश्मीर मं रहि जाथें, वो मन श्रीनगर के छोटे होटल धन हरीसा के दुकान मन मं रसोइया मन के संग काम करथें. (पढ़व: श्रीनगर मं ताते तात हरीसा के सुवाद)
भारी जाड़ अऊ अति मऊसम हमेसा चुनोती बने हवंय. साल 2017 मं, 25 जनवरी के दिन गुरेज मं चार जगा हिमस्खलन होईस, जेन मं फरीद के घर दावर ले करीबन साढ़े 8 कोस (26 किमी) दूरिहा, मज़गुंड नीरू मं 20 झिन सैनिक अऊ चार झिन आम नागरिक जान गंवाइन.
वोला वो बखत सुरता हवय जब गुरेज मं प्राथमिक इलाज मिले घलो मुस्किल रहिस. साल 1970 के दसक के सुरु मं, तीर के मरकूट गाँव के एक मौलवी साहब जड़कल्ला मं बीमार पर गे. बरफ 12 ले 15 फीट जमे रहिस. “लोग उनको चारपाई में ले गये (लोगन मन वोला खटिया मं ले गीन).” करीबन 29 कोस दूरिहा बांदीपुर के अस्पताल तक हबरे मं दू दिन लाग गे.
एक ठन अऊ घटना, एक झिन उस्तादमोहतरम [गुरूजी] के बेटी गरभ के पीरा मं रहिस. वो बखत आम जनता बर कोनो हेलीकॉप्टर नइ रहिस, अऊ जचकी बर वोला अस्पताल ले जाय मं एक लाख रूपिया ले जियादा खरचा होय रतिस. भारत के सेना मदद बर आइस. “सेना ने सद्भावना के ज़रिये मदद देना शुरु किया [सेना ह अपन ऑपरेशन सद्भावना के तहत मदद करिस].”
आज, वइसने हालत सुधर गे हे, ओकर बाद घलो जम्मू-कश्मीर मं अनुसूचित जनजाति के रूप मं सूचीबद्ध ये समाज, आफत-बिपत मं बहिर निकरे बर अभू घलो सेना के भरोसे हवंय. गरभधरे अऊ जचकी एक ठन समस्या बने हवय.

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भारत अऊ पाकिस्तान के बीच नियंत्रण रेखा (एलओसी) लकठा मं हवय, ते पायके सीजन मं बहिर जाय के छोड़ सरहद पार ले गोलाबारी ओकर समाज बर बड़े चिंता के बिसय आय.
कैंपसाइट तीर मं टहलत फरीद अचानक रुक जाथे. वो ह कहिथे, “ ये रोड के एक ठन हाल के घटना मोर दिमाग मं हवय. साल 2005 के बात आय, मोर गाँव के बाप-बेटा अपन मेढ़ा मन ला चरावत रहिन. वो मन ला गाँव आय बर पुल पार करे रहिस,” वो ह रोड के दूसर छोर डहर आरो करत कहिथे.
तीर के मस्जिद ले फरीद, जेन ह वो मन ला देख सकत रहिस, सुरता करथे, “बाप पीछे-पीछे बेटा आगे-आगे.” वो ह वो मन के उपर बम गिरत देखिस. फेर वो परिवार के मुसीबत इहींचे खतम नइ होइस, वो ह कहिथे. उहिच दिन परिवार के एक झिन नोनी, जेन ह सेना के कैम्प के तीर परिच्छा देय बर अपन घर ले निकरे रहिस, अंधाधुंध गोलाबारी के चपेट मं आ गीस.
ओकर बोली रोंवासी हो जाथे जब वो ह बताथे, “एक ही दिन में एक का लड़का गया एक की लड़की गई [एकेच दिन, एक झिन अपन बेटा गंवाइस अऊ दूसर ह अपन बेटी].” गोलाबारी मं 20-25 लोगन मन घायल होइन अऊ कतको मवेसी घलो मारे गीन.
एक ठन अऊ घटना मं, गोलाबारी सेती बजार के तीर ठाढ़े एक ठन बस मं आगि लग गे, जेकर ले जम्मो तुलैल बजार तबाह हो गे. वो ह बताथे के आगि तेज़ी ले बगर गीस. वो बखत अधिकतर घर मन लकरी ले बने होत रहिन.
फरीद सवाल करत कहिथे, “कोनो इहाँ काबर मरे ला चाही? अइसने जगा मं कोन रहे ला चाही?” अब वो ह अपन सुवारी, चार बेटा अऊ तीन झिन बेटी के संग, नामी तुलैल घाटी जाय के पहिली आखिरी बजार, दावर मं रहिथे.

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पहिली घलो, गुरेज मं गुजर बसर सेती जियादा काम नइ रहिस. “लोगन मन मवेसी चराके धन सेना बर कुली के काम करके गुजारा करत रहिन.” वो ह कहिथे, “सब्बो करा घोड़ा रहिस, अऊ मुलाजमात बिलकुल कम थी [काम बूता बनेच कम रहिस].” कतको लोगन मन समाज के पारंपरिक कला, पट्टू बुनई मं लगे रहंय. पढ़व: पट्टू बुनकर: टूटत जिनगी के ताना-बाना
जब लोगन मं घाटी के दूसर इलाका मं गीन, त वो मन ला बढ़िया नऊकरी, पढ़ई-लिखई अऊ इलाज मिलिस. फरीद बताथे के येकरे सेती लोगन मन बांदीपुर, कंगन, गंदेरबल अऊ श्रीनगर के निचला इलाका मन मं जाके बसे लगिन.
जइसने-जइसने जियादा लोगन मन बहिर चले गीन, अपन महतारी भाखा मं गोठियाय घलो मुस्किल होगे हवय. जब दर्द-शिन के लोगन मन सामान बिसोय बर बांदीपुर जाथें, कतको लोगन मन दूसर कश्मीरी मन के आगू शिना मं गोठ-बात नइ करंय. “एक कॉम्प्लेक्स होता है. शायद हम अलग हैं [हमन ला एक ठन खास किसिम के हिचक होथे. हो सकत हे हमन अलग आन].”
हर बखत अइसने नइ रहिस. फरीद कहिथे, “जब मंय नान लइका रहंय, त मंय सब्बो ला शिना मं गोठियावत देखत रहेंय. फेर अब, जब घलो बजार जाथों, त अपन समाज के नवा पीढ़ी के लइका मन ला उर्दू, हिंदी, कश्मीरी अऊ कभू-कभू अंगरेजी मं घलो गोठ बात करत देखथों.”
शिना एक ठन दर्दिक भाखा आय जेन ह इंडो-आर्यन भाषा परिवार ले हवय. वइसे येला यूनेस्को ह बिपत मं परे भाखा के सूची मं रखे नइ ये, ओकर बाद घलो येकर बोलेइय्या मन भारी घटत जावत हवंय. अब येला एक ठन बिपत मं परे भाखा के रूप मं बांटे गे हवय.
बीते 40 बछर ले,फरीद हब्बा खातून सांस्कृतिक मंडली के सदस्य के रूप मं अपन महतारी भाखा ला बचाय मं लगे हवंय. गुरेज के लोगन मन के आर्थिक मदद अऊ कभू-कभू अपन प्रस्तुती ले मिले पइसा ले ये मंडली, अपन समाज के भाखा अऊ संस्कृति के बारे मं जागरूक करे बर स्कूल मन मं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करथें.

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गुजरत बखत के संग बचाय के ओकर कोसिस ला बना के रखे मुस्किल होवत जावत हे. इहाँ के करीबन सब्बो लइका गुरेज के बहिर पढ़थें, येकरे सेती सिखेइय्या कोनो नइ ये. “स्कूल मन मं बिहनिया के प्रार्थना, किताब अऊ सांस्कृतिक कार्यक्रम उर्दू, हिंदी अऊ अंगरेजी मं होथें.” वो ह कहिथे, “जब मंय स्कूल मन मं हमर सांस्कृतिक कार्यक्रम के बखत शिना मं गीत गाथों, त अधिकतर लइका मन येकर अरथ ला समझे मं दिक्कत होथे.”
गणतंत्र दिवस अऊ स्वतंत्रता दिवस जइसने बड़े कार्यक्रम कश्मीरी अऊ उर्दू मं होथें. वो ह आगू कहिथे, “फेर अब हमर मंडली ह ये सोच ला बदल दे हवय अऊ ये कार्क्रम मन ला अपन महतारी भाखा मं करे के कोसिस करत हवय, जेन मं लोकगीत अऊ कविता घलो हवंय.”
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“काय तुमन जानत हव के चौक काय होथे?” तारिक परवेज लोन दसवीं क्लास के लइका मन ले पूछथे, जेन मन वोला असमंजस नजर ले देखथें. सरकारी हाई स्कूल वानपोरा के एक झिन आतुर लइका पूछथे, “ये काय आय, सर? ये ह कइसने दिखथे?” हेडमास्टर तखता मं एक ठन अनजान जिनिस बनाय सुरु करथे अऊ लइका मन ले कहिथे, ये करघा आय. हमर सियान मन येला ऊनी कपड़ा बनाय बर काम मं लावत रहिन.”
तारिक अपन काम करत, तख्ता मं एक ठन घूमत भौरा के चित्र बनाथें, वो ह अपन लइका मन ले पूछथें, “येला शिना मं काय कहिथें? एक झिन लइका येला ‘लट्टू’ कहिथे, जेन ह कश्मीरी भाखा के शब्द आय. फेर जब कोनो नइ बताय सकंय तब तारिक के आवाज आते, “येला थुरकैती कहिथें.”
ओकर पढ़ाय के काम चलत रहय, अऊ 30 झिन के क्लास मं सिरिफ एकेच झिन लइकाच अपन महतारी भाखा शिना मं जिनिस मन के नांव बताय सकिस. तारिक कहिथे, “अइसनेच बनेच अकन शब्द हवंय जेन हमर रोज के जिनगी के बोलचाल ले नंदा गे हवंय काबर के हमन दीगर भाखा मन ला अपना ले हवन.”

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गुरेज के लइका मन घर ले बहिर निकरथें, त स्कूल मं रोज के गोठ-बात मं उर्दू अऊ कश्मीरी जइसने दीगर भाखा सीखथें. येकर छोड़ अधिकतर लइका मन हिंदी अऊ अंगरेजी घलो सीखथें.
तारिक कहिथे, “जेन लइका बारों महिना गुरेज मं रहिथे, वोला भाखा मं गोठियाय मं कभू दिक्कत नइ होवय.” फेर जेन मन काम-बूता, पढ़ई, इलाज धन मऊसम के समस्या सेती बहिर जाथें, वो मन ला अक्सर अपन महतारी भाखा ला बिन अटके बोले मं दिक्कत होथे.
तारिक के बात सुनके, ओकर संगी टीचर तुरते बोल परथे, “मोर छोटे बेटी ह खुदेच उर्दू सीखे हवय, फोन मं देख के.” वो ह वोला ये भाखा नइ सिखाइस. फेर जब वो ह अपन छोटे बेटी ला शिना सिखाय के कोसिस करिस, त वो ह जियादा रुचि नइ लीस. अब एकेच बछर होय हवय के वो ह धीरे-धीरे ये भाखा ला सीखे सुरु कर देय हे. ओकर बड़े बेटी शिना बोलथे काबर के वो ह स्कूल जाय लगे हवय जिहां वोला ओकर महतारी भाखा मं पढ़ाय जाथे.
तारिक के मानना आय के ये भाखा ला आगू ले जाय के एकेच तरीका येला घर अऊ बजार मं बोले आय. वो ह कहिथे के वो ह कश्मीरी अऊ उर्दू सीखे के खिलाफ नइ ये काबर के येकर ले लइका मन ला गुरेज ले बहिर जाके कश्मीर के दीगर इलाका के लइका मन मेल-जोल मं काम आही, “फेर अपन भाखा ला बिसोरे अपन पहिचान ला बिसोरे जइसने आय,” वो ह कहिथे.
फेर समाज के कतको लइका मन अपन दरदी पहिचान ला उजागर करे मं असुरच्छित मसूस करथें काबर के वो मन डेर्रावत रहिथें के वो मन ला दर्दे ( ये शब्द कभू-कभू समाज बर अपमान के रूप मं कहे जाथे) कहे जाही.

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गुरेज घाटी कश्मीर के लोगन मन बर रेशम के रद्दा होवत रहिस, जेन ह बेपार अऊ तिरिथ बर बांदीपुरा ले गुरेज होवत गिलगित जावत रहिन. हज जवेइय्या घलो इहीच रद्दा मं जावत रहिन.
गुरेज अऊ द्रास मं रहेइय्या दर्द-शिन जनजाति के खास सांस्कृतिक अऊ भाषाई मूल दर्दिस्तान ले जुड़े हवंय, जेन ह एक ठन ऐतिहासिक इलाका रहिस जेन ह कभू कश्मीर घाटी ले लेके गिलगित अऊ अफ़ग़ानिस्तान तक बगरे रहिस. मसूद अल हसन समून कहिथे के कश्मीरी अऊ दरद के नाता 1947 के बंटवारा ले घलो कहूँ जियादा गहिर हवय. जम्मू-कश्मीर सरकार के 73 बछर के पूर्व शिक्षा निदेशक कहिथे, “पार्टिशन तो कल की बात है [बंटवारा तो कालि के बात आय].” दर्द सदियों ले जम्मू-कश्मीर मं रहत हवंय.
बारहवीं सदी के कश्मीरी इतिहासकार कल्हण ह कश्मीर के राजा मन के संस्कृत काव्यात्मक इतिहास, राजतरंगिणी, मं गुरेज के दर्दों के जिकर करे गे हवय. मसूद कहिथे के गुरेज के राजा अक्सर घाटी के शासक मन संग लड़ई करत रहंय, अऊ एक ठन बड़े लड़ई दुदकथ पर्वत मं दर्दों अऊ राजा हर्ष (भारत के हर्षवर्धन नइ) मं होय रहिस.
अपन कोनो खास लिपि नइ होय सेती, ये भाखा मौखिक परंपरा मन मं, लोककथा मं अऊ लोकगीत मन मं जींयत रहे हवय. फेर दसकों ले सीजन मं बहिर जाय, सरहद पर ले गोलाबारी अऊ इलाका मं राजनीतिक अऊ सांस्कृतिक उथल-पुथल ये समाज ला अपन महतारी भाखा ले अऊ दूरिहा करत हवय.
“जब तुमन श्रीनगर जाहू अऊ देखहू के उहाँ के 50 ठन घर मं सिरिफ एकेच घर शिना मं गोठ-बात करथे, त वो भाखा कइसने बांचही?” ओकर समाज के लइका मन दीगर लइका मन ले कश्मीरी धन दूसर भाखा मं गोठियाहीं. ओकर कहना आय के हो सकथे के एक पीढ़ी अपन महतारी भाखा बोलत रहय, फेर दूसर पीढ़ी बर वो भाखा खतम हो जाही.
ये बखत मसूद एक ठन एकीकृत शिना लिपि के तियारी मं लगे हवंय अऊ उत्तरी कश्मीर के बांदीपुर इलाका मं रहत हवंय. “शिना बर अब तक ले दू ठन लिपि बनाय गे हवय, एक ठन जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन के, जेन ह रोमन मं लिखे गे रहिस, अऊ दूसर गिलगित अऊ शिना ज़बान नांव के, जेन ह पाकिस्तान के गिलगित मं जिला शिक्षा अधिकारी डॉ. शुजा नामुस ह उर्दू मं लिखे रहिस, जेन मं नस्तालीक लिपि बउरे गे रहिस.”
दूनोंच मामला मं, दस्तावेज़ीकरन वो मन के शोध तकेच ले रहिस. न त ग्रियर्सन अऊ न डॉ. नामस मूल बोलेइय्या रहिन. ध्वनिविज्ञान ले जुड़े कतको जानकारी सटीक रूप ले दर्ज नइ करे जाय सकिस.
मसूद कहिथें के शिना मं चार खास व्यंजन ध्वनि हवंय, “जो दायीं-बायीं किसी लेंग्वेज में नहीं हैं [जेन ह परोस के भाखा मन मं नइ ये], उर्दू धन फ़ारसी ला छोड़व, कश्मीरी मं घलो नइ यें.” येकरे सेती, खास विशेषक चिन्हा के जरूरत रहिस, फेर कोनो घलो बनाय नइ सकिन. वो ह बतावत जाथे के बाद मं पाकिस्तान के काराकोरम यूनिवर्सिटी के एक झिन प्रोफेसर मोहम्मद अमीन जिया ह वो बखत बियाकरन अऊ ओकर नियम लिखिस जब कंप्यूटर हालेच मं आय रहिस. फेर वो ह घलो लिपि उपर धियान नइ दीस.
तारिक मसूद के बात ले सहमत होवत कहिथे, “अगर लिपि नइ ये त हमन भाखा ला कइसने लिखबो अऊ सिखाबो? शिना बियाकरन उपर किताब छपे के बाद, समाज के कतको लोगन मन एक ठन व्हाट्सएप ग्रुप घलो बनाय रहिन, फेर वो ह काम नइ आइस.”
फरीद ये घलो कहिथे, “एक उचित लिपि मददगार साबित होही काबर के अधिकतर शिना साहित्य ये बखत घलो उर्दूच मं लिखे जाथे.” नवा लिपि सुरु करे ले लइका मन अपन महतारी भाखा के अऊ लकठा मं आ जाहीं. वो ह कहिथे, “जब हमर लइका मन कश्मीर ले रूस अऊ जर्मनी जइसने दूसर देश मन मं जाथें, त हम वो मन ला वो बिदेसी भाखा नइ सिखावन, है ना? वो मन उहिंचे सीखथें.”

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मसूद के मानना आय के साहित्य ह वो मूल जिनिस आय जेन ह भाखा मन ला आगू ले जाथे. वो ह कश्मीरी साहित्य, लाल देद, शेख-उल-आलम (जउन ला नुंद ऋषि घलो कहे जाथे) अऊ मध्यकालीन अऊ आधुनिक काल के कतको दीगर कवि मन के कविता कोती आरो करथे. वो ह कहिथे के आज घलो कश्मीरी मं गद्य अऊ पद्य बनेच अकन रचे जाथे, जेन ह अवेइय्या बखत मं भाखा के अस्तित्व के आधार बनही, “फेर हम शिना के बारे मं अइसने नइ कहे सकन.”
मसूद के ‘शिना’ बर अनूठा खाका बनाय के तियारी साल 1975 मं सुरु होइस, जब वो ह कश्मीर यूनिवर्सिटी मं उर्दू अऊ फारसी पढ़ाय के नऊकरी करत रहिस. “मंय लोककथा अऊ लोकगीत संकेलत रहंय,” फेर मंय अपन आप ले पूछंव, येला कइसने लिखे जाय!”
बाद मं जब वो ह शिक्षा निदेशक बनिस, त जम्मू-कश्मीर राज मं चौथी क्लास तक ले महतारी भाखा मं पढ़ाय बर एक ठन नवा भाषा नीति के घोषना करे गीस. वो ह कहिथे, “ये ह लिपि बनाय के सबले बढ़िया बखत रहिस,” अऊ येला कंप्यूटर के काम के मुताबिक घलो बनाय गीस.
वो ह एक ठन खाका बनाय के कोसिस करिस अऊ एक ठन प्राइमर घलो लिखिस. फेर ओकर बाद वो ह अपन नऊकरी छोड़ दीस, “जिनगी के गणित गड़बड़ा गे,” अऊ वो ह येला कभू छपाय नइ सकिस. वो ह कहिथे के रिटायर के बाद वो ह एक पईंत अऊ अपन कोसिस सुरु कर दे हवय.

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लिपि ला मानकीकृत करे के कतको कोसिस के बाद, ओकर पाठ्यपुस्तक पुमिकी शिना किताब चौथी क्लास के लइका मन बर छपिस. वइसे, वो बखत घलो, शिना एक ठन वैकल्पिक बिसय रहिस. वो ह कहिथे,“मंय भाषा कार्यकर्ता बन गेंय अऊ कम से कम मोर इलाका मं तो लिपि के मानकीकरन होगे हे.” हालेच मं, महतारी भाखा के दस्तावेजीकरन करे के दीगर कोसिस घलो होय हवय. कश्मीर यूनिवर्सिटी, श्रीनगर के भाषा विज्ञान विभाग ह शिना बियाकरन उपर एक ठन किताब घलो छापे हवय.
मसूद कहिथे के जब तक लिपि के मानकीकरण नइ हो जाय, तब तक पहिली स्तर मं, कम से कम दसवीं क्लास तक, शिना ला पढ़ई के माध्यम बनाय ले भाखा ला लंबा बखत तक ले आगू ले जाय मं मदद मिलही. ओकर कहना आय के वइसे ये स्तर मं रसायन विज्ञान, भौतिकी जइसने उच्च धन तकनीकी पढ़ई बर येला पढ़ई के माध्यम बनाय संभव नो हे, ओकर बाद घलो येला लेके तुरते कुछु करे जरूरी आय, “नइ त ये भाखा ह नंदा जाही.”
वो ह अपन नऊकरी बखत गुरेज मं बिताय बखत के एक ठन किस्सा सुनाथे. गर ओकर समाज के कोनो घलो मइनखे ओकर ले दफ्तर मं कश्मीरी धन उर्दू मं गोठियाय, त “ मंय वोला डपटत कहंव के मंय शिना मं गोठियावत हवं तंय घलो गोठिया!”
वो ह पूछथे, “अब घर के लोगन मन ले बात करे बर हवय त वो ह घलो अंगरेजीच मं करहू? कोनो घलो फ़्रांसीसी अपन घर मं अंगरेजी नइ बोलय. अंगरेजी के गुलामी वाले बीमारी सिरिफ हम भारतीय लोगन मन मं हवय.”
ओकर कहना आय के आजकल के लइका मन अंगरेजी मं पढ़थें अऊ बिदेसी भाखा बोले मं वो मन के सब्बो दिमागी ताकत खप जाथे. वो ह कहिथे, “अइसने नो हे के सिरिफ अंगरेज मन हुसियार होथें. काय हम हिंदुस्तानी मन भोकवा अन? अइसने नो हे, फेर हमर [भारतीय] भाखा मन के विकास नइ होवत हे काबर के हम अपन बखत बिदेसी भाखा सीखे मं लगा देथन.”

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राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 मं प्रस्ताव हवय के पाँचवीं क्लास तक पढ़ई के माध्यम लइका के महतारी भाखा होय ला चाही. मसूद कहिथे, “ये ह सायेद भारत के शिक्षा क्षेत्र मं अब तक के सबले समझदारी वाले बात आय, फेर ये ह चुनोतीपूर्ण घलो होही.”
शिक्षा बोर्ड ह येला पहिली क्लास के कश्मीरी अऊ डोगरी के पाठ्यपुस्तक बर लागू कर दे हवय. ओकर कहना आये के वो शिना मं अपन पाठ्यपुस्तक के जल्दी छपे ला अगोरत हवंय, काबर के वो ह येला करीबन बछर पहिलीच भेज दे रहिस.
इही बखत मं, मसूद अपन संगी कार्यकर्ता मन के संग शिना लिपि के मानकीकरण करे मं लगे हवंय, “फेर मंय तुमन ला ये भरोसा नइ देय सकवं के ये ह जल्दी पूरा हो जाही. ये मं बनेच काम करे के जरूरत हवय, अऊ मोला ये डर हवय के मंय अऊ सियान होवत जावत हवंव,” वो ह कहिथे.
रिपोर्टर ये कहिनी मं मदद सेती मसूद अल हसन समून, बशीर अहमद तेरू, फरीद अहमद लोन अऊ अबरार-उल-आलम के आभार जतावत हवय.
गुलाम रसूल मुश्ताक के शिना कविता के अनुवाद फरीद ह करे हवंय अऊ प्रतिष्ठा पंड्या ह संपादित करे हवंय. मसूद अल हसन समून के कविता के अंगरेजी मं अनुवाद मुजमिल अऊ प्रतिष्ठा पंड्या ह करे हवंय.
पारी के नंदावत जावत भाखा परियोजना (ईएलपी), अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी ले मिले मदद के हिस्सा आय. येकर मकसद भारत के खतरा मं परे भाखा मन ला, ओकर बोलेइय्या मन के बात ला अऊ अनुभव के दस्तावेजीकरन करे आय.
येकहिनी पारी सीनियर फेलोशिप 2025 के मदद ले लिखे गे हवय.
अनुवाद: निर्मल कुमार साहू
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