रुजुलुक सु यारसु थाय गोव बहनै आंथे आंथे, एक दम ओ पाशा थे गोव हमलै आंथे आंथे...
ऊ अइलन त, बाकिर बहाना बना के निकल गइलन, ऊ देखलन त बाकिर मुंह फेर के चल गइलन
संगी-साथी लोग बहाना बना के हमरा छोड़ देलक, देखलस आ मुंह फेर के चल गइल



रुजुलुक सु यारसु थाय गोव बहनै आंथे आंथे, एक दम ओ पाशा थे गोव हमलै आंथे आंथे...
ऊ अइलन त, बाकिर बहाना बना के निकल गइलन, ऊ देखलन त बाकिर मुंह फेर के चल गइलन
संगी-साथी लोग बहाना बना के हमरा छोड़ देलक, देखलस आ मुंह फेर के चल गइल
किशनगंगा नदी के टकटकी लगा के देखत, फरीद अहमद लोन धीरे-धीरे गुलाम रसूल मुश्ताक के नजम पढ़ रहल बाड़न. गुलाम, जम्मू-कश्मीर के दर्द-शिन समाज के नामी कवि रहलन.
हमनी नदिया तीरे बइठल बानी. सामने नदी पर बरफ के पातर परत जमल बा. बरफ के छोट-छोट टुकड़ा बहत चलल जा रहल बा. नदी पूरा तरीका से अबही जमल नइखे, बाकिर ओकर मिजाज बदल रहल बा. मौसम बदल रहल बा.
तनिए दूर घाटी के मेहरारू लोग कोई 25-30 किलो जलावन के लकड़ी आ घास के गट्ठर सब उठइले चलल जा रहल बा. दोसरा ओरी कुछ मेहरारू लोग माथ पर गोबर के टोकरी उठवले जाता. सरदी में एकर गोइंठा जरा के खाना बनावे के काम में आई. हमनी लगे गुरेज घाटी में घूम रहल सैलानी लोग धीरे-धीरे आपन राह पकड़ रहल बा.
फरीद बदलत मौसम ओरी इसारा कर रहल बाड़न, जेकर असर खाली नदिए ना, बलुक सरदी खातिर तइयार हो रहल गुरेजो में लउक रहल बा. दर्द-शिन समुदाय से आवे वाला फरीद बतावेलन कि ओह लोग के बहुते बड़ आबादी गुरेज में बसल बा. सन् 2011 के जनगणना के हिसाब से इहंवा 37,992 दार्दिक लोग रहेला.

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अक्टूबर में सरदी सुरु होखते, घाटी बरफ से ढंक जाला. 68 बरिस के फरीद कहले, “खाली बूढ़े लोग इहंवा रह जाला.” बरफबारी मारे चलल-फिरल मोटा-मोटी नामुमकिन हो जाला. “जे लोग घाटी में रह जाला, ऊ जादे करके घर के भीतरिए रहेला.”
केतना बेरा त बरफ बारी एतना होखेला कि घाटी में कहूं-कहूं बरफ 15 फीट ले मोटा हो जाला. इलाका छव महीना ले बाकी राज्य सब से कट जाला. एहि चलते 80 प्रतिशत आबादी इहंवा से पलायन खातिर मजबूर बा. बागवानी विभाग से सेवा मुक्त भइल सीनियर तकनीशियन फरीद कहेलन, “केहू कश्मीर के दोसर हिस्सा में चल जाला. त केहू हिमाचल, चाहे पंजाब जाके मजूरी करेला.” कश्मीर में जेतना लोग बच जाला, ऊ लोग श्रीनगर के छोट होटल, चाहे हरीसा होटल में रसोइया के काम करेला. (पढ़ीं: भोरहीं से हरीसा खाए खातिर लाइन लाग जाला)
हड्डी गला देवे वाला सरदी आ एकदम विपरीत मौसम लोग खातिर लगातार चुनौती बनल रहेला. सन् 2017 में 25 जनवरी के गुरेज में चार ठो हिमस्खलन भइल रहे. एह में सेना के 20 जवान आउर चार गो आम नागरिक मारल गइल. हादसा फरीद के गांव दावर से 26 किमी दूर मजगुंड नीरू में भइल रहे.
उनका उहो बखत इयाद बा जब गुरेज में मामूली इलाज तक करवावल भारी रहे. एक बेर के बात बा. 1970 के दसक के सुरु में लगे के मरकूट गांव के एगो मौलवी साहब सरदी में बेमार पड़ गइलन. बरफ 12 से 15 फीट ले पड़ल रहे. ऊ बतइलन, “उनका चौकी पर लाद के ले जाए पड़ल.” अस्पताल इहंवा से 86 किमी दूर, बांदीपोरा में रहे. उहंवा ले पहुंचे में दू दिन लाग गइल.
अइसने एगो दोसर घटना में एगो उस्ताद मोहतरम (मास्टर) के लइकी के भारी समस्या वाला जचगी से गुजरे पड़ल. तब आम आदमी खातिर हेलिकॉप्टर ना होखत रहे. जचगी खातिर अस्पताल पहुंचे में एक लाख से जादे के खरचा आवत रहे. तब भारतीय सेना मदद कइलक. “आर्मी सद्भावना ऑपरेसन के जरिए मदद देलक”
आज हालत पहिले से त नीमन जरूर भइल बा. बाकिर जम्मू-कस्मीर में अनुसूचित जनजाति मानल जाए वाला ई समुदाय इमरजेंसी में आजो सेने पर निर्भर बा. गरभ वाली मेहरारू आ उनकर जचगी में आजो दिक्कत आवेला.

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भारत-पाक नियंत्रण रेखा (एलओसी) इहंवा से लगहीं बा. एहि चलते मौसमी पलायन के साथे-साथे, सीमा पार गोलीबारी भी एह लोग खातिर गंभीर बात बा.
फरीद शिविर क्षेत्र में टहलत-टहलत अचके रुक जात बाड़न. कहे लागत बाड़न, “एह रोड के एगो बात हमरा अबले इयाद बा. सन् 2005 के दिन रहे. हमनी के गांव में एगो बाप-बेटा लोग भेड़ चरावे निकलल रहे. ऊ लोग इहे पुल से गांव में घुसहीं वाला रहे,” ऊ सड़के के दोसर छोर देखावत कहत रहस.
“बाप पाछू-पाछू, बेटा आगे-आगे,” फरीद इयाद करत बाड़न. ऊ ओह घरिया लगहीं के मस्जिद में रहस आउर दूनो लोग के दूर से देखत रहस. अचके ऊ देखलन, एगो बम आके ओह लोग पर गिर पड़ल. ओह परिवार के मुसीबत इहंई समाप्त ना भइल, ऊ बतइलन. ओही दिन, उहे परिवार के लइकी परीक्षा देवे सेना के शिविर लगे से गुजरत रहे. उहो अंधाधुंध फायरिंग के चपेट में आ गइल.
पारी के ई सब बतावत उनकर आवाज कांपे लागल. “एके दिन में एगो घर के लइका गइल आउर लइकियो चल गइल.” ओह गोलीबारी में 20-25 लोग के जान गइल रहे, आउर बहुते मवेसियो मरल रहे.
ऊ एगो आउर घटना बतावे लगलन. गोलीबारी चलते तुलैल बजार लगे एगो बस में आग लाग गइल. पूरा बजार में नुकसान भइल. ऊ बतइलन कि आग बहुते तेजी से फइलल. ओह घरिया जादेतर इमारत सब लकड़िए के बनत रहे.
“केहू इहंवा मरे के काहे चाही? एह जगहा के रहे के चाही?” अब ऊ दावर में रहेलन. दावर नामी तुलैल घाटी से पहिले पड़ेवाला आखिरी बजार बा. उनका संगे उनकर घरवाली, चार ठो लइका आउर तीन ठो लइकी लोग रहेला.

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पहिलहूं गुरेज में कमाई-धमाई के जादे मौका ना रहत रहे. “लोग मवेसी चरा के, चाहे सेना खातिर कुली के काम करके आपन पेट पालत रहे.” सभे लगे घोड़ा होखत रहे, आ “मुलाजमत (नौकरी) एकदम कम रहे,” ऊ कहेलन. बहुते लोग त पट्टू बीने के काम करत रहे, जे एह समुदाय के पारंपरिक कला बा. (पढ़ीं: पट्टू कारीगर: उघड़ रहल बा जिनगी के बिनाई)
घाटी के लोग दोसर हिस्सा में गइल त, ओह लोग के काम करे, पढ़े आउर इलाज के जादे नीमन सुविधा मिलल. एही से फरीद कहेलन, लोग बांदीपोरा, कंगन, गांदरबल आ श्रीनगर के डाउनटाउन में बसे लागल.
जइसे-जइसे लोग बाहिर बसत चल गइल, आपन बोली-भाषा में बात करल कम होखत गइल. अब दर्द-शिन लोग बांदीपोरी में आपन रसद कीने जाला, त केतना लोग कश्मीरी के सामने शिना में ना बतियावेला. “हमरा हीन बुझाला, लागेला हमनी अलग बानी.”
अइसन हिसाब-किताब हरमेसा से ना रहे. फरीद बतावे लगलन, “छोट रहीं, त सभे शिने में बतियावत रहे. बाकिर आज बजार जाइला, त देखिला हमनी के समाज के सयान लइका-लइकी सब उर्दू, हिंदी, कश्मीरी आ कबो-कबो त अंगरेजिये में बात करत करेला.”
शिना एगो दार्दिक भाषा बा, जे इंडो-आर्यन भाषा परिवार से आवेला. अइसे त यूनेस्को एकरा संकट से घिरल भाषा के सूची में नइखे रखले. बाकिर एकरा बोले वाला लोग के गिनती तेजी से घट रहल बा. अब एकरा “संकटग्रस्त” भाषा मानल जाला.
पछिला चालीस बरिस से फरीद, हब्बा खातून सांस्कृतिक समूह के सदस्य के रूप आपन मातृभाषा के बचावे में लागल बाड़न. एह समूह के चलावे खातिर गुरेज घाटी में रहे वाला लोग पइसा देवेला. कबो-कबो समूह के लोग के आपन प्रदर्शनो खातिर पइसा मिलेला. समूह स्कूल में सांस्कृतिक कार्यक्रमो करेला जेसे समुदाय के भाषा आ संस्कृति के बारे में जागरूकता फइलावल जा सको.

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बाकिर ई कोसिस दिन-ब-दिन मुस्किले भइल जा रहल बा. इहंवा के मोटा-मोटी सभे बच्चा गुरेज से बाहर पढ़े जाला, एहि से कोई सीखे वाला नइखे. “स्कूल में भोर के प्रार्थना, किताब आ सांस्कृतिक कार्यक्रम उर्दू, हिंदी आ अंगरेजी में होखेला,” ऊ बतइलन. “हम जब स्कूल सब में शिना में गीत गाइला, त जादे करके लइका सब ओकर माने ना बूझे.”
गणतंत्र दिवस आ स्वतंत्रता दिवस जइसन मेन कार्यक्रम सब जादेतर कश्मीरी आ उर्दू में होखेला. “बाकिर अब हमनी के ग्रुप के सोच बदल रहल बा. हमनी एह सभे कार्यक्रम के आपन मातृभाषा में करे के कोसिस कर रहल बानी. एकरा में लोकगीत आ कविता के पाठो रहेला.”
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“रउआ मालूम बा, चौक का होखेला?” तारिक परवेज आपन दसमा कक्षा के लरिकन से पूछलन. लरिका लोग उनका अचरज से देखे लागल. एगो जिज्ञासु लरिका उनका से पूछलक, “का बाटे मास्टर जी? कइसन देखाई देवेला.” हेडमास्टर बोर्ड पर एगो अजीब चीज के फोटो बनइलन आउर कहलन, “ई करघा बा. हमनी के पुरखा लोग एकरे से ऊनी कपड़ा बीनत रहे.”
तारिक के अभ्यास जारी रहत बा. अब ऊ बोर्ड पर एगो लट्टू बनइलन. “शिना में हमनी एकरा का कहिला?” एगो लइका ओकरा ‘लट्टू’ कहलक, जे एगो कश्मीरी शब्द बा. एकरा बाद कक्षा शांत हो गइल, जबले तारिक एकर जवाब नइखन देत, “एकरा थुरकैटी कहल जाला.”
अभ्यास जारी बा. बाकिर 30 लरिकन के कक्षा में खाली एके गो लरिका एकर नाम शिना में पहिचान पाइल. तारिक कहेलन, “अइसन बहुते शब्द बा, जे हमनी के रोजमर्रा के बोल-चाल से बिला चुकल बा. काहेकि हमनी दोसर के भाषा बोले लागल बानी.”

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गुरेज के लरिका सब जब घर से बाहिर जाला, त स्कूल में ऊ लोग बोल-चाल खातिर उर्दू आ कश्मीरी सीख लेवेला. एकरा अलावे ऊ लोग हिंदी आ अंगरेजियो सीख जाला.
तारिक कहेलन, “बच्चा जब पूरा 12 महीना गुरेज में रहेला, त ओकरा आपन ई भाषा बोले में कवनो दिक्कत ना आवे.” बाकिर जे बच्चा रोजगार, पढ़ाई, सेहत आ मौसम चलते पलायन कर जाला, ऊ लोग के आपन माई बोली शुद्ध रूप से बोले में मुस्किल आवेला.
तारिक के बात सुन के उनका संगे काम करे वाली एगो मास्टरनी बतावे लगली, “हमार छोट लइकी अपने उर्दू सीख लेली, फोन देख-देख के.” अइसे त ऊ ओकरा ई भाषा ना सिखइले रहस, बाकिर ऊ जबो शिना सिखावे के जतन करेली, बुच्ची जादे रूचि ना देखावस. उनकर बड़ लइकी शिना बोलेली, काहेकि ऊ अइसन स्कूल में पढ़ेले जहंवा मातृभाषा में पढ़ावल जाला.
तारिक के हिसाब से जदि मातृभाषा के जिंदा रखे के बा त, एके तरीका बा. घर आ बाजार में एकरे में बात कइल जाव. ऊ मानेलन कि कश्मीरी आ उर्दू सीखल गलत नइखे, बलुक ई लइका सब के गुरेज से बाहिर जाए के स्थिति में ओह लोग के दोसरा से जुड़े में मदद करेला. बाकिर ऊ इहो कहेलन, “आपन भाषा भुला गइनीं, त बुझीं आपन पहचानो भुला गइनीं.”
बाकिर समुदाय के बहुते लरिका लोग आपन दार्दिक पहचान बतावे में कतराला. ऊ लोग डेराला कि लोग उऩका “दर्दे” बोल के चिढ़ाई. एह शब्द के कइएक बार समुदाय के नीचा देखावे खातिर इस्तेमाल कइल जाला.

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गुरेज घाटी कबो कश्मीरीलोग खातिर सिल्क मार्ग के रूप में जानल जात रहे. इहंवा से व्यापारी आ हज यात्री लोग बांदीपोरा से होत गिलगिट तक जात रहे.
गुरेज आ द्रास इलाका में बसे वाला दर्द-शिन जनजाति के आपन सांस्कृतिक आ भाषाई पहचान बा, जे दर्दिस्तान से जुड़ल बा. इतिहास के नजर से देखल जाव, त ई इलाका कबो कश्मीर घाटी से लेके गिलगिट आ अफगानिस्तान ले फइलल रहे. कश्मीरी लोग आ दर्दों के रिस्ता 1947 के बंटवारो से पुरान बा. अइसन मसूद अल हसन समून कहेलन, “पार्टीशन त कल के बात बा.” 73 बरिस के मसूद जम्मू आ कश्मीर सरकार के शिक्षा विभाग में निदेशक रह चुकल बाड़न.
बारहवीं सदी के कश्मीरी इतिहासकार कल्हण आपन किताब राजतरंगिणी में गुर्ज के दर्दों के जिकिर कइले बाड़न. किताब कश्मीर के राजा लोग के संस्कृत में लिखल काव्यात्मक इतिहास बा. मसूद बतावेलन कि गुरेज के राजा लोग के घाटी के शासक लोग से अक्सरहा लड़ाई होत रहे. अइसने एगो बड़ लड़ाई दुदकथ पर्वत पर राजा हर्ष (भारत के सम्राट हर्षवर्धन ना) आ दर्दों के बीच भइल रहे.
शिना भाषा के आपन कवनो लिपि ना रहल. एह चलते एकरा अपना बचावे खातिर मुंहजबानी परंपरा, लोककथा आ लोकगीत के भरोसे रहे के पड़ल. बाकिर दसकन से जारी मौसमी पलायन, सीमा पार से गोलीबारी आउर राजनीतिक-सांस्कृतिक उथल-पुथल चलते ई समुदाय आपन मातृभाषा से दूर भइल जा रहल बा.
“रउआ श्रीनगर जाएम त, उहंवा 50 घर पर खाली एक घर में लोग शिना बोलत मिली. अइसे में भाषा कइसे जिंदा रही?” उनकर समुदाय के लरिका लोग दोसरा से या त कश्मीरी में बात करेला, या दोसर आम भाषा में. उनकर कहनाम बा कि एह हालात में जादे से जादे एक पीढ़ी तक ई भाषा बची. बाकिर ओकरा बाद वाला में ई खतम हो जाई.
आजकल मसूद उत्तरी कश्मीर के बांदीपोरा इलाका में रहके एगो एकीकृत शिना लिपि खातिर काम करत बानी. “अबले शिना खातिर दू लिपि तइयार भइल रहे. पहिल, जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन द्वारा रोमन लिपि में रहे. दोसर डॉ. शुजा मूस द्वारा उर्दू (नस्तलीक लिपि) में, जेकर शीर्षक बा- गिलगिट आ शिना जबान. नामूस गिलगिट, पाकिस्तान में जिला शिक्षा अधिकारी रहस.”
बाकिर दुनो मामला में दस्तावेजीकरण खाली उनकरे शोध ले सीमित रहल. ग्रियर्सन आ डॉ नामूस दूनो में से केहू शिना भाषी ना रहे. केतना ध्वनि सब के सही तरीका से दरज ना कइल जा सकल.
मसूद के हिसाब से शिना में चार खास व्यंजन ध्वनि बा, “दहिना-बावां कवनो भाषा में नइखे- उर्दू, फारसी त दूर, कश्मीरियो में नइखे.” एहि से खास चिन्ह के जरूरत महसूस कइल गइल. बाकिर केकरो प्रयोग सफल ना रहल. ऊ बतावत बाड़न कि बाद में पाकिस्तान के काराकोरण विश्वविद्यालय में प्रोफेसर मोहम्मद अमीन जिया कंप्यूटर के सुरुआती दौर में ही व्याकरण पर त लिखलन, बाकिर लिपि पर बिसेष ध्यान ना देलन.
मसूद के एह बात से तारीक भी सहमत बाड़न. ऊ कहेलन, “लिपिए नइखे, त हमनी भाषा लिखम आ सिखाएम कइसे? शिना व्याकरण पर किताब छपल त समुदाय के कुछ लोग व्हाट्सऐप ग्रुपो बनइलक. बाकिर ई जादे दिन ले ना चलल,” ऊ कहलन.
फरीदो के कहनाम बा, “एगो सही लिपि होखल बहुते जरूरी बा. काहेकि जादे करके शिना साहित्य आजो उर्दुए में लिखल जा रहल बा.” ऊ कहेलन, “हमनी के लरिका लोग जब कश्मीर से रूस, चाहे जर्मनी जाला, त का हमनी ओह लोग के उहंवा के भाषा पहिले से सिखा के भेजेनी. ना... ऊ लोग उहां जाके अपने सीख लेवेला.”

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मसूद मानेलन कि भाषा के जीवित रखे के एकमात्र जरिया साहित्ये बा. ऊ कश्मीरी साहित्य के उदाहरण देके समझावत बाड़न. लाल देद, शेख-उल-आलम (जिनका नन्द ऋषि के नाम से भी जानल जाला), आउर दोसर मध्य आ आधुनिक काल के कवि के काव्य आजो पढ़ावल जाला. आजो कश्मीरी भाषा में गद्य-पद्य दुनो विधा में बेहिसाब रचना लिखल जा रहल बा. मतलब ई भइल कि ई भाषा आवे वाला समय में भी जिंदा रही. “बाकिर इहे बात हम शिना के बारे में ना कह सकिला.”
शिना खातिर एगो बिसेष लिपि बनावे के मसूद के काम 1975 में सुरु भइल. ओह घरिया ऊ कश्मीर बिस्वबिद्यालय में फुल-टाइम उर्दू आ फारसी पढ़ावत रहस. “हम लोककथा आ लोकगीत जुटावत रहीं. बाकिर अपना से इहे पूछत रहत रहीं कि एकरा लिखल कइसे जाई?”
बाद में जब ऊ शिक्षा निदेसक बनलन, त जम्मू आ कश्मीर सरकार एगो नया भाषा नीति के ऐलान कइलक. एकरा में तय कइल गइल कि बच्चा लोग चौथा कक्षा ले आपन मातृभाषा में पढ़ी. ऊ कहले, “लिपि के बिकसित करे के ई सुनहरा मौका रहे.” ऊ लिपि के कंप्यूटर के अनुकूल भी बनइलन.
लिपि के बिकसित करे के मकसद से ऊ एगो प्राइमर भी लिखलन. बाकिर जब ऊ पद से हटलन, “निजी कारण से ई काम पूरा ना हो सकल,” आउर ऊ एकरा कबो छपवा भी ना सकलन. उनकर कहनाम बा कि सेवामुक्त भइला के बाद ऊ एक बार फेरु से आपन काम सुरु कइले बाड़न.

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लिपि के मानकीकरण के कइएक कोसिस कइल गइल. तब जाके उनकर किताब पुमिकी शिना चौथा कक्षा खातिर छपल. अइसे त शिना अबहियो पढ़ल जरूरी नइखे. ऊ बतावत बाड़न, “हम भाषा खातिर आवाज उठावे लगनी. अब कम से कम हमार इलाका में त ई लिपि मानकीकृत हो चुकल बा.” बाद में एह मातृभाषा के लिखे-जोगावे के आउर कइएक कोसिस कइल गइल. कश्मीर बिस्वबिद्यालय, श्रीनगर के भाषाविज्ञान विभाग भी शिना व्याकरण के एगो किताब छपले बा.
मसूद कहेलन कि जबले लिपि में एकरूपता नइखे आ जात, तबले शिना के पढ़ाई में इस्तेमाल करे से, कम से कम दसमा ले, भाषा के जिंदा रख सकेला. ऊ मानलेन कि उच्च शिक्षा, चाहे रसायन, चाहे भौतिकी जइसन तकनीकी विषय खातिर अबही ई भाषा उपयुक्त नइखे. बाकिर एह दिसा में लगातार कोसिस करत रहे के बा, “ना त ई भाषा मर जाई.”
गुरेज में ड्यूटी घरिया के ऊ एगो किस्सा इयाद करत बाड़न. उनकर समुदाय के कवनो आदमी उनका से उर्दू, कश्मीरी में बात करे, “त एक दिन हम ओकरा डांट देनी आ कहनी हम तोहरा से शिना में बोलत बानी, त तोहरो इहे भाषा में हमरा से बात करे के चाहीं.”
ऊ सवाल करत बाड़न, “का रउआ आपन घर में अंगरेजी में बात करिला? कवनो फांसीसी आपन घर में अंगरेजी ना बोले. सिरिफ हमनिए के गोरन के गुलामी करे के बेमारी बा.”
आजकल बच्चा जब अंगरेजी में पढ़ेला, त ओकर दिमाग के जादेतर ताकत एगो बिदेसी भाषा सीखे में खतम हो जाला, ऊ कहेलन. “का अंगरेजे लोग ढेर होसियार बा, आ हमनी मूरख बानी? साफ बा, कि अइसन नइखे. त दिक्कत इहे बा कि हमनी बिदेसी भाषा सीखे में लाग गइल बानी, आपन भाषा पर ध्याने नइखी देत.”

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सन् 2020 के नयका शिक्षा नीति (एनईपी) में पचमा ले मातृभाषा में पढ़ावे के बात कहल गइल बा. मसूद के कहनाम बा, “भारत में पढ़ाई-लिखाई में अबले जे काम भइल, ओह में ई सबले सोच-समझ के उठावल कदम बा, बाकिर चुनौती त भरपूर बा.”
पहिल कक्षा के किताब कश्मीरी आ डोगरी में आ चुकल बा. मसूद कहेलन कि शिना में आपन किताब ऊ साल भर पहिलहीं भेज चुकल बाड़न. अब त बस छपाई के इंतजार बा.
मसूद आपन टोली संगे शिना लिपि के एक रूप में ढाले के कोसिस करे में लागल बाड़न. उनकर कहनाम बा, “बाकिर हम एह बात के गारंटी नइखी दे सकत कि ई जल्दी पूरा हो जाई. काम बहुते बा. आउर हम त अब बूढ़ भइल जात बानी.”
रिपोर्ट लिखे में मदद करे खातिर मसूद अल हसन, बशीर अहमद तेरू, फरीद अहमद लोन आ अबरार-उल-आलम के आभार रही.
गुलाम रसूल मुश्ताक के लिखल शिना नज्म के व्याख्या फरीद कइले बाड़न आ ओकर संपादन प्रतिष्ठा पंड्या कइले बाड़ी. मसूद अल हसन समून के नज्म के अंगरेजी में अनुवाद मुजामिल आ प्रतिष्ठा पंड्या लोग कइले बा.
पारी एनडेंजर्ड लैंग्वेजेज प्रोजेक्ट (ईएलपी), अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के आर्थिक सहायता से चल रहल पहल के एगो हिस्सा बा. एकर मकसद भारत के लुप्त हो रहल बोली-बानी के आवाज देवल आउर ओकरा बोले वाला लोग के अनुभव लिखल-संजोवल बा.
ईस्टोरी पारी सीनियर फेलोशिप 2025 के अंतर्गत प्रकाशित भइल बा.
अनुवाद: स्वर्ण कांता
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