ए बेरा बेटी इयम तंय मार्ची बारी ते, बेरा बेटी इयम तंय
धांय से ददा जो डेनाम रे, बिहा गोटे नी
मन मजूर डेना ला रे, बिहा गोटे नी
मार्ची बारी ते, बेरा बेटी इयम तंय
धांय से ददा जो डेनाम रे, बिहा गोटे नी
छत्तीसगढ़ी
मिरचाबारी मं रोवत हे नोनी
जाव न ददा बात चलाय बर
जुर जाही त मोर बिहाव करा देबे
जाव न ददा जल्दी, बात करे बर
जुर जाही त मोर बिहाव करा देबे
लखेश्वरी बाई खड़िया जब गाये ला धरथे त वो ह एक ठन अलग दुनिया मं हबर जाथे, जब वो ह अपन आंखी ला तरी करके, अपन हाथ मं माइक धरे वोला देखत रइथे. ये ओकर बर नोहर बेरा आय. लखेश्वरी के आस-पड़ोस के बनेच कम लोगन मन वोला गावत धन ओकर ओकर भाखा मं बोलत सुने के मन करथें, जऊन ला हमन रिकार्ड करत हवन. फेर हरेक बोल के संग, ओकर मन एक पल-छिन मं 54 कोस दूरिहा रायगढ़ मं हबर जाथे, जिहां वो ह इहीच बोली के संग अपन बचपना गुजारे रहिस.
“अब मंय काकर तीर गोठियाअंव? सास-ससुर घलो अब नइ यें. मंय लइका मन ले कहिथों, ‘अपन माटी महतारी बोली मं मोर ले गोठियावव अऊ सीखव.’ फेर ये लइका मन सुनथें कहाँ? पोता-पोती मन के बातेच छोड़ देवव, मंइच ये गाँव भर मं अकेल्ला बांचे हवं जऊन ह खड़िया कहिथों,” पाटनदादर के 55 बछर के ये आदिवासी महतारी के अवाज मं ओकर पीरा झलक परथे.
महासमुंद जिला के ये गांव मं वोला ‘जूना’ के नांव ले बलाय जाथे, जिहां वो ह बुढुवा खड़िया ले बिहाव के बाद ले बस गे हवय, जऊन ह अब 60 बछर के हो चुके हे. राज सरकार डहर ले जेन एक-दू एकड़ जमीन मिले हवय, ओकर ले गुजारा नइ चलय अऊ येकरे सेती दूनोंच बनिहारी करथें. लखेश्वरी कहिथे, “जब मंय रायगढ़ ले इहाँ आय रहेंय त सास-ससुर ले खड़िया मं गोठियावत रहंय. अब वो मन गुजर गीन त मोर तीर खड़िया बोलेइय्या कोनो नइ ये.” ओकर घर-गोसियाँ बुढुवा बताथे, “बोले नइ बने, येकरे सेती नइ बोलंव. इहाँ छत्तीसगढ़ी चलन मं हवय. येकरे सेती ये भाखा कोन समझही?”




