ए बेरा बेटी इयम तंय मार्ची बारी ते, बेरा बेटी इयम तंय
धांय से ददा जो डेनाम रे, बिहा गोटे नी
मन मजूर डेना ला रे, बिहा गोटे नी
मार्ची बारी ते, बेरा बेटी इयम तंय
धांय से ददा जो डेनाम रे, बिहा गोटे नी
[हरियर मरिचाई के खेत में बेटी रोएली
बाऊजी, जाईं ना बर खोज लाईं,
मनवा मिल गइल हमार, नीमन लागे त उनका से हमर बियाह करा दीहीं
हरियर मरिचाई के खेत में बेटी रोएली
बाऊजी, जाईं ना, जल्दी बात करीं,
नीमन लागे त उनका से हमार बियाह करा दीहीं]
लखेश्वरी बाई खड़िया गीत गावत-गावत एगो दोसरे लोक में पहुंच जाली. हाथ में पकड़ल माइक्रोफोन में उनकर आंख गड़ल बा. ई उनका खातिर खास घड़ी बा. जवन भाषा में हमनी लखेश्वरी के रिकॉर्ड करत बानी, ओह में बोलनिहार लोग बहुते कम बचल बा. लखेश्वरी के आजू-बाजू रहे वाला कमे लोग के दिलचस्पी उनकर गीत आ बोली में बा.
“अब हम केकरा से बतियाईं आपन महतारी बोली में? सास-ससुर भी ना रहल लोग जिनका से बोलत रहीं. आपन लरिकन सब से कहेनी, ‘हमरा से आपन माटी महतारी बोली में बोले के सीख ल लोगनी.’ बाकिर बालक लोग कहंवा सुनेला? पोता-पोती के त बाते छोड़ दीहीं. पूरा गांव में हमहीं खड़िया बोले वाला अकेला प्राणी बचल बानी.”
छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिला के ग्राम पाटनदादर के रहे वाली लखेश्वरी बाई. बुढुवा खड़िया से बियाह के बाद ऊ इहंई बस गइली, जे अब साठ बरिस के हो चुकलन. राज्य सरकार से मिलल दु एकड़ जमीन पर खेती से घर ना चल पावेला. एहि से दुनो प्राणी लोग खेतिहर मजूरी करेला. “हम रायगढ़ से जब इहंवा अइनी, त आपन सास-ससुर से खड़िया में बतियावत रहीं. अब त ऊ लोग ना रहल, आउर हमरा लगे केहू नइखे जेकरा से हम एह भाषा में बतिया सकीं.” उनकर घरवाला बुढुवा बतावत बाड़न, “हम सही से हिज्जे ना कर पाईं एहि से खड़िया ना बोलीं. इहंवा त छत्तीसगढ़ी के राज बा. एकरा के समझे वाला बा?”




