बिहार में दरभंगा ज़िले के तारडी गांव के खेतिहर मज़दूर के बेटे लाल सिंह 1997 में मुंबई पहुंचे थे. घर यानी ग़रीबी और संघर्ष, जबकि मुंबई में शहरी चकाचौंध थी. वह भारत के 2.1 करोड़ प्रवासियों में थे, जो गांवों से शहर आए और उस दशक मुंबई पहुंचे 25 लाख लोगों में से भी एक थे. सभी को रोज़ी-रोटी की तलाश थी. उन्होंने सिक्योरिटी गार्ड, फ़ैक्ट्री में दिहाड़ी मज़दूर, ऑफ़िस बॉय, डॉग-वॉकर और रसोइए का काम किया. इस शहर ने उन्हें एक नया जुनून और सपना दिया. उन्हें अभिनय और लेखन से प्यार हो गया.
मुंबई में 28 साल के बाद लाल सिंह गुज़ारे के लिए काम करते हैं. मगर पर्दे के पीछे वह अभी भी अपना हुनर निखार रहे हैं और अपने रचनात्मक सपने पूरे कर रहे हैं. यह लाल सिंह और उनके इस लंबे सफ़र की कहानी है, जो डराती है, तो प्रेरणा भी देती है.
अनुवाद: अजय शर्मा


