दलित टीम की जीत ही जातिगत हिंसा भड़काने के लिए काफ़ी थी. जब देवेंद्रराज अपने परीक्षा देने जा रहा था, तो हमलावरों ने बस रोक ली, उसे बाहर खींचा और सड़क पर ही उस पर धारदार हथियारों से वार किए. जब उसके पिता ने मुझे यह बताया, तो मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई. यह हिंसा किसी खेल के कारण नहीं थी—यह सत्ता और प्रभुत्व का मामला था. असल में यह विचार कि एक दलित छात्र कबड्डी में प्रभुत्वशाली जाति के लड़कों को हरा नहीं सकता, इस क्रूर घटना की जड़ में था. और विडंबना यह है कि देवेंद्रराज अपने क्षेत्र के सबसे अच्छे कबड्डी खिलाड़ियों में से एक माना जाता है.
डॉक्टर ने मुझे बताया कि उसके सिर और हाथों पर गहरे घाव हैं, जिनमें से एक चोट बहुत गंभीर है. उसकी उंगलियां आंशिक रूप से कट गई थीं और उन्हें ठीक होने में दो से तीन महीने लगेंगे. डॉक्टर ने कहा, “उंगलियों का ठीक से जुड़ना ज़रूरी है, तभी प्लास्टिक सर्जरी की जा सकेगी.”
तंग गणेश ने कहा, “मैं ईंट-भट्ठे में काम करता हूं. मेरे दो बच्चे हैं. देवेंद्रराज मेरा बड़ा बेटा है — वह पलयमकोट्टई के एक स्कूल में पढ़ता है. छोटा वाला बच्चा मेरी बेटी है. मैं और मेरी पत्नी दोनों रोज़ भट्ठे पर काम करने जाते हैं.”
उसके बाद उन्होंने धीरे-धीरे अपने जीवन की कहानी सुनाई: “जब मैं छोटा था, मुझे जाति के बारे में कोई समझ नहीं थी. हमारे किसी शिक्षक ने कभी आंबेडकर या पेरियार के बारे में बात नहीं की. दसवीं की परीक्षा के बाद आर्थिक कठिनाइयों के कारण मैंने आईटीआई (तकनीकी प्रशिक्षण संस्थान) में मोटर मैकेनिक का कोर्स करने के लिए आवेदन किया. प्रवेश शुल्क 650 रुपए था, और मेरे लिए इतनी रक़म जुटाना भी मुश्किल था. मेरी मां ने दूसरों से उधार लेकर पैसे जुटाए.
“मैं बड़े सपनों के साथ वहां गया था, हाथ में वह पैसे लेकर, सीखने की इच्छा के साथ. लेकिन वहां पहुंचते ही अधिकारियों ने हममें से दो-तीन लोगों के नाम पुकारे और कहा कि सीटें नहीं हैं. उन्होंने हमें बाहर धकेल दिया और गेट बंद कर दिया. मैं भी उनमें से एक था. मुझे समझ ही नहीं आया, क्यों ऐसा किया गया. मैं उस गेट के सामने रो पड़ा. उन्होंने कहा कि मेरे अंक कम थे, लेकिन अगर ऐसा था, तो मुझे प्रवेशपत्र क्यों दिया गया? यह सवाल मुझे कई वर्षों तक परेशान करता रहा.”