केहू के उनकर नाम मालूम ना रहे. ऊ त बस टोला के एगो पगला बुढ़वा रहस. ऊ दिनो भर हंसस आउर रात भर रोवस, एहि से लोग उनका पागल कहत रहे. अपने में बड़बड़ास, सिंधी में, चाहे उर्दू में. अइसे त उनकर कहल जादेतर बात सब फालतू आ बकबके लागे, खाली तब जब ऊ गालिब के शेर पढ़स:
कोई वीरानी-सी वीरानी है
दश्त को देख के घर याद आया
(कवनो खालीपन जइसन खालीपन बा
दश्त के देख के घर इयाद आइल)
उनका जदि रउआ शेर पढ़त सुन लेब, त लागी कि बुद्धि आ पागलपन के बीच के सीमा खतम हो रहल बा.
बरिसन पुरान उनकर घर आज मोहल्ला के एगो कोना में उजाड़ पड़ल बा. एगो सुनसान आ ढहल मकान के दुआरी लउकता, जहंवा ऊ दू ठो आवारा कुकुर संगे बइठ के रतजग्गा करत रहस.
ऊ इहंवा कब अइलन आउर एह घर में बस गइलन, नइखे मालूम. ना त केकरो उनकर उमिर पता बा. बाकिर उनकर झुर्री वाला चेहरा से उनकर पाकल उमिर साफ पता चलत रहे, जे भारत के सिकुड़ल, चुराइल, मीसल नक्सा जेका लउके.
उनका बारे में कइएक कहानी प्रचलित बा. केहू कहेला कि बंटवारा घरिया ऊ आपन घर-परिवार से बिछड़ गइलन. त केहू बतावेला बहुत बाद में भइल दंगा में उनकर पूरा परिवार खतम हो गइल. आ कुछ लोग त उनका ब्यापारियो बतावेला. बाकिर जब उनकर घरवाली आ दू ठो लइका लोग के देस से निकाल देवल गइल, त जमीन-जायदाद त खतम होइए गइल, संगे-संगे ऊ आपन होस से हाथ धो बइठलन. माथ पर चिक्कट हरियर कपड़ा बन्हले ऊ आदमी मुसलमान बा, केहू नइखे जानत. रोज सांझ आपन फाटल-पुरान गद्दी लगे धइल छोट अलमारी में दिया-बाती करे आउर अइसे बड़बड़ाए कि लागे प्रार्थना करत होखे, हिंदू बा इहो केहू नइखे जानत. लोग ओकरा पर तरस खाए आउर बाचल-खुचल खाए के दे देवे. तबो जब लोग के अपना खाए के ठिकाना ना रहत रहे, आपन हिस्सा में से तनी उपरा के उनका खिया देवे.
बाकिर केतना दिन से ऊ रोटी के एगो निवाला नइखन लेले. केहू उनका पहिले जइसन गली-चौक पर टहलतो ना देखलक. अइसन लागत रहे कि ऊ कहूं जकड़ के रह गइल होखस. ना त ऊ दिया-बाती करस, ना गालिब के इयाद करस. बस अपना में सिमटत चल गइलन. केकरो अपना लगे सटे ना देलन, आउर एक दिन खतम हो गइलन. केहू दावा करता कि उनका कहत सुनलक कि ऊ कवनो कांटा वाला तार निगल लेलन, आउर ऊ गरदन में अटक गइल. केहू दोसर आदमी कहलक कि उनका कोरोना हो गइल होखी.


