दिसंबर 2021 की एक ठंडी सुबह थी. घने कोहरे से ढकी सड़कों के बीच अमर थोरबोले महाराष्ट्र के सोलापुर ज़िले में 70 किलोमीटर की यात्रा कर पुलिस अधीक्षक के कार्यालय की ओर जा रहे थे. उनके साथ डीज़ल से भरा एक कनस्तर और माचिस की डिब्बी थी.
थोरबोले ने अपनी मोटरसाइकिल खड़ी की, धीरे-धीरे कनस्तर का ढक्कन खोला और पुलिस स्टेशन की ओर बढ़ते हुए अपने ऊपर डीज़ल उड़ेल लिया. उन्होंने माचिस जलाई. पहले आग की सिसकारी सुनाई दी, पुलिस बाद में पहुंची.
इस घटना से पहले के दो महीनों में, उनके गृहनगर बार्शी के ऋण-वसूली एजेंट वर्षीय थोरबोले और उनके परिवार को धमका रहे थे. उन्हें उस ऋण के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा था, जिसकी राशि उनकी मांगी गई रक़म से पांच गुना अधिक थी. और पुलिस उनके मामले की जांच करने से इंकार कर रही थी, क्योंकि जिन लोगों पर धोखाधड़ी का आरोप था उनका स्थानीय राजनीति में भारी प्रभाव था.
एक वर्ष पहले, मई 2020 में, मराठा समुदाय से आने वाले थोरबोले ने ताज़ा नाश्ते के अपने व्यवसाय का विस्तार करने की योजना बनाई थी. उन्होंने अपनी बचत का बड़ा हिस्सा लगाकर एक प्लाट ख़रीदा. वे अपने स्टॉल पर पहले से बेचे जा रहे पोहा और वड़ा जैसे नाश्तों के साथ मसाले भी बेचना चाहते थे. साथ ही, उस प्लाट पर स्टोरेज की सुविधा वाला एक गोदाम भी बनाना चाहते थे.
इसके लिए उन्होंने 5 लाख रुपए का ऋण लेने का निर्णय किया. थोरबोले ने शिव शक्ति अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक से ऋण के लिए आवेदन किया, क्योंकि शाखा प्रबंधक गणेश बारंगुले उनके पूर्व नियोक्ता युवराज बारंगुले के व्यावसायिक साझेदार थे.
इस परिचय और विश्वास का ही परिणाम था कि जब गणेश ने यह कहकर दोबारा दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर करने को कहा कि “पहले आवेदन में कुछ ग़लती थी”, तो थोरबोले और उनकी पत्नी ने इसे एक सामान्य प्रक्रिया समझा.
जुलाई 2020 की शुरुआत में गणेश ने उन्हें बताया कि ऋण स्वीकृत हो गया है और उनसे ऋण अदायगी की गारंटी के रूप में 10 हस्ताक्षरित कोरे चेक जमा करने को कहा.
पति-पत्नी ने बिना कोई सवाल किए ऐसा कर दिया. सुजाता थोरबोले (34) कहती हैं, “हमारे संबंध अच्छे थे. हमें उन पर [गणेश और युवराज पर] भरोसा था.”
यह भरोसा लगभग एक वर्ष तक बना रहा. फिर एक दिन ऋण-वसूली एजेंट उनके घर में घुस आए और सुजाता को धमकाने लगे कि अगर थोरबोले ने 25 लाख रुपए के अपने आवास ऋण की क़िस्तें चुकाना जारी नहीं रखा, तो बैंक उनकी संपत्ति ज़ब्त कर लेगा. सुजाता कहती हैं, “मैं पूरी तरह उलझन में पड़ गई थी.”











