गुणवंत के घर की छत उनके ऊपर तो नहीं गिरी, लेकिन इसने उन्हें उनके खेत तक ज़रूर दौड़ाया। उनके दिमाग में वह नज़ारा आज भी ताज़ा है। “हमारे खेत के किनारे पड़ी टिन की वह छत फट चुकी थी और उड़ती हुई मेरी ओर आई,” वह याद करते हैं। “मैं भूसे के ढेर के नीचे छिप गया और किसी तरह ज़ख्मी होने से खुद को बचाया।”

ऐसा हर दिन नहीं होता है जब कोई छत आपका पीछा करने लगे। अंबुलगा गांव में गुणवंत हुलसुलकर जिस छत से भाग रहे थे, वह इसी साल अप्रैल में ओलावृष्टि के साथ घातक हवाओं के कारण टूट गई थी।

भूसे के ढेर से बाहर निकलते हुए 36 वर्षीय गुणवंत, निलंगा तालुका में अपने खेत को मुश्किल से पहचान सके। “यह 18-20 मिनट से ज़्यादा नहीं रहा होगा। लेकिन पेड़ गिर गए थे, मरे हुए पक्षी इधर-उधर बिखरे पड़े थे, और हमारा पशुधन बुरी तरह से घायल हो गया था,” वह पेड़ों पर ओलावृष्टि के निशान दिखाते हुए कहते हैं।

“हर 16-18 महीने में ओलावृष्टि या बेमौसम बारिश ज़रूर होती है,” उनकी 60 वर्षीय मां, धोंडाबाई, अंबुलगा में अपने दो कमरे के पत्थर और कंकरीट से बने घर के बाहर सीढ़ियों पर बैठी हुई कहती हैं। वर्ष 2001 में, उनके परिवार ने 11 एकड़ खेत में दलहन (उड़द और मूंग) की खेती छोड़ आम और अमरुद के बगीचे लगाना शुरू कर दिया। “हमें पेड़ों की देखभाल साल भर करनी पड़ती है, लेकिन मौसम के बहुत ज़्यादा खराब होने की कुछ ही मिनटों की घटना हमारे पूरे निवेश को नष्ट कर देती है।”

यह इस वर्ष हुई एक बार की घटना नहीं थी। मूसलाधार बारिश और ओलावृष्टि सहित खराब मौसम की ऐसी घटनाएं महाराष्ट्र के लातूर जिले के इस भाग में पिछले एक दशक से देखने को मिल रही हैं। अंबुलगा में ही उद्धव बिरादार का एक एकड़ में आम का बाग भी, 2014 की ओलावृष्टि में गिर गया था। “मेरे पास 10-15 पेड़ थे। वे उस तूफान से मर गए। मैंने उन्हें पुनर्जीवित करने का कोई प्रयास नहीं किया,” वह कहते हैं।

“ओलावृष्टि जारी है,” 37 वर्षीय बिरादार कहते हैं। “2014 के तूफान के बाद पेड़ों को देखना दर्दनाक था। आपने उन्हें लगाया, उनकी देखभाल की, और फिर वे मिनटों में ही उजड़ गए। मुझे नहीं लगता कि मैं ये सभी काम दुबारा कर पाऊंगा।”

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गुणवंत हुलसुलकर (ऊपर बाएं), उनकी मां धोंडाबाई (ऊपर दाएं) और पिता मधुकर (नीचे दाएं) अपरिहार्य ओलावृष्टि के कारण बागों को छोड़ने पर विचार कर रहे हैं, जबकि सुभाष शिंदे (नीचे बाएं) कहते हैं कि वह इस बार खरीफ सीज़न से शायद पूरी तरह दूर रहेंगे

ओलावृष्टि? वह भी मराठवाड़ा क्षेत्र के लातूर जिले में? यह एक ऐसी जगह है, जहां वर्ष के आधे से ज़्यादा दिन, पारा 32 डिग्री सेल्सियस या उससे ऊपर होता है। इस साल अप्रैल के पहले सप्ताह में ताज़ा ओलावृष्टि हुई जब तापमान 41 से 43 डिग्री के बीच था।

लेकिन जैसा कि यहां लगभग हर किसान आपको अतिउत्साह में बताएगा, वे अब तापमान, हवामान (मौसम) और वतावारण के व्यवहार का पता नहीं लगा सकते हैं।

हां, वे इतना ज़रूर समझते हैं कि सालाना बारिश के दिनों की संख्या कम और गर्म दिनों की संख्या ज़्यादा हुई है। 1960 में, जिस वर्ष धोंडाबाई का जन्म हुआ था, लातूर में सालाना कम से कम 147 दिन ऐसे होते थे जब तापमान 32 डिग्री या उससे ऊपर पहुंच जाता था, जैसा कि न्यूयॉर्क टाइम्स द्वारा एक ऐप से जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के बारे में पोस्ट किए गए आंकड़े दिखाते हैं। इस साल, यह संख्या 188 दिन होगी। धोंडाबाई जब 80 वर्ष की होंगी, तो इन सबसे गर्म दिनों की संख्या 211 हो जाएगी।

“विश्वास करना ​​मुश्किल है कि हम जुलाई के अंत की ओर बढ़ रहे हैं,” सुभाष शिंदे ने तब कहा था, जब मैंने पिछले महीने अंबुलगा में उनके 15 एकड़ खेत का दौरा किया था। खेत बंजर दिख रहा है, मिट्टी भूरी है और हरियाली का कोई निशान नहीं है। 63 वर्षीय शिंदे अपने सफेद कुर्ते से एक रूमाल निकालते हैं और अपने माथे का पसीना पोंछते हैं। “मैं आमतौर पर जून के मध्य में सोयाबीन बोता हूं। लेकिन इस बार, मैं खरीफ सीजन से पूरी तरह दूर रह सकता हूं।”

तेलंगाना के हैदराबाद से दक्षिणी लातूर को जोड़ने वाले इस 150 किलोमीटर के क्षेत्र में शिंदे जैसे किसान मुख्य रूप से सोयाबीन की खेती करते हैं। शिंदे बताते हैं कि लगभग 1998 तक, ज्वार, उड़द और मूंग यहां की बुनियादी खरीफ फसलें थीं। “उन्हें लगातार बारिश की आवश्यकता होती है। हमें एक अच्छी फसल के लिए समय पर मानसून की ज़रूरत होती थी।”

शिंदे और दूसरे अधिकांश लोगों ने वर्ष 2000 के आसपास से यहां सोयाबीन की खेती शुरू कर दी, क्योंकि वह कहते हैं, “यह एक लचीली फसल है। अगर मौसम का मिजाज थोड़ा भी बदलता है, तो इस पर प्रभाव नहीं पड़ता है। यह अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी आकर्षक था। मौसम के अंत में हम पैसे बचाने में सफल रहते थे। इसके अलावा, सोयाबीन की कटाई के बाद इसके अवशेष पशु चारे के रूप में काम आते थे। लेकिन पिछले 10-15 वर्षों से, सोयाबीन भी अनिश्चित मानसून से निपटने में सक्षम नहीं रहा है।”

ताज़ा ओलावृष्टि के दौरान लातूर में बड़े पैमाने पर तबाही: टूटे हुए कुसुम (ऊपर बाएं; फोटो: नारायण पवले); ओलावृष्टि के बाद एक खेत (ऊपर दाएं; फोटो: निशांत भद्रेश्वर); नष्ट हो चुके तरबूज़ (नीचे बाएं; फोटो: निशांत भद्रेश्वर); मुर्झा चुके ज्वार (नीचे दाएं; फोटो: मनोज आखडे)

और इस साल, “जिन्होंने फसल बोई है, वे अब पछता रहे हैं, क्योंकि शुरुआती बारिश के बाद सूखा पड़ने लगा,” लातूर जिले के कलेक्टर, जी श्रीकांत कहते हैं। जिले भर में केवल 64 फीसदी बुआई (सभी फसलों की) हुई है। निलंगा तालुका में, 66 फीसदी। ज़ाहिर है, जिले में कुल फसली क्षेत्र का 50 फीसदी से अधिक हिस्सा, सोयाबीन का सबसे अधिक नुकसान हुआ है।

लातूर मराठवाड़ा के कृषि क्षेत्र में है और यहां पर सालाना औसत बारिश 700 मिमी होती है। इस साल यहां 25 जून को मानसून आया था और तब से यह अनिश्चित बना हुआ है। जुलाई के अंत में, श्रीकांत ने मुझे बताया कि इस अवधि के लिए सामान्य वर्षा 47 प्रतिशत कम थी।

सुभाष शिंदे बताते हैं कि 2000 के दशक की शुरुआत में, एक एकड़ में 4,000 रुपये की लागत से की गई सोयाबीन की खेती से लगभग 10-12 क्विंटल उपज मिलती थी। करीब दो दशक बाद, सोयाबीन की क़ीमत 1,500 रुपये से दोगुनी बढ़ कर 3,000 रुपये प्रति क्विंटल हो जाएगी, लेकिन, वह कहते हैं, खेती की लागत तीन गुना हो जाएगी और प्रति एकड़ उत्पादन आधा रह जाएगा।

राज्य कृषि विपणन बोर्ड के आंकड़े शिंदे के दावे को सत्यापित करते हैं। बोर्ड की वेबसाइट का कहना है कि 2010-11 में सोयाबीन का रकबा 1.94 लाख हेक्टेयर था और उत्पादन 4.31 लाख टन। वर्ष 2016 में, सोयाबीन की खेती 3.67 लाख हेक्टेयर में की गई, लेकिन उत्पादन सिर्फ 3.08 लाख टन था। प्रति एकड़ 89 प्रतिशत की वृद्धि हुई, लेकिन उत्पादन में 28.5 प्रतिशत की गिरावट आई।

धोंडाबाई के पति, 63 वर्षीय मधुकर हुलसुलकर, वर्तमान दशक की एक और बात की ओर इशारा करते हैं। “2012 के बाद से, हमारे द्वारा कीटनाशकों का उपयोग बहुत बढ़ गया है। केवल इस साल, हमें 5-7 बार छिड़काव करना पड़ा है,” वह कहते हैं।

धोंडाबाई बदलते परिदृश्य पर इसमें अपनी बात जोड़ती हैं, “पहले हम चील, गिद्ध और गौरैये नियमित रूप से देखते थे। लेकिन पिछले 10 वर्षों से, वे दुर्लभ से दुर्लभ होते जा रहे हैं।”

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मधुकर हुलसुलकर अपने आम के पेड़ के नीचे: 2012 के बाद से, हमारे द्वारा कीटनाशकों का उपयोग बहुत बढ़ गया है। केवल इस साल, हमें 5-7 बार छिड़काव करना पड़ा है’

“भारत में कीटनाशक का उपयोग अभी भी प्रति हेक्टेयर एक किलोग्राम से कम है,” लातूर स्थित पर्यावरणविद् अतुल देउलगांवकर कहते हैं। “अमेरिका, जापान और अन्य उन्नत औद्योगिक राष्ट्र 8 से 10 गुना अधिक उपयोग करते हैं। लेकिन वे अपने कीटनाशकों को विनियमित करते रहते हैं, हम नहीं करते। हमारे में कैंसरकारी तत्व होते हैं, जो खेत के आसपास के पक्षियों को प्रभावित करते हैं। यह उन्हें मार देता है।”

शिंदे उत्पादकता में गिरावट के लिए जलवायु परिवर्तन को ज़िम्मेदार ठहराते हैं। “मानसून की चार-महीने की अवधि [जून-सितंबर] में हमारे पास 70-75 बरसात के दिन होते थे,” वह कहते हैं। “बूंदा-बांदी लगातार और धीरे-धीरे होती रहती थी। पिछले 15 वर्षों में, बारिश के दिनों की संख्या आधी हो गई है। जब बारिश होती है, तो हद से ज़्यादा होती है। और इसके बाद 20 दिनों तक सूखा रहता है। इस मौसम में खेती करना असंभव है।”

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के लातूर के आंकड़े उनके दावे को सत्यापित करते हैं। वर्ष 2014 में, मानसून के चार महीनों में वर्षा 430 मिमी थी। अगले साल यह 317 मिमी थी। 2016 में इस जिले में उन चार महीनों में 1,010 मिमी बारिश हुई। 2017 में, यह 760 मिमी थी। पिछले साल, मानसून के मौसम में लातूर में 530 मिमी बारिश हुई थी, जिसमें से 252 मिमी अकेले जून में हुई। यहां तक ​​कि उन वर्षों में भी जब जिले में ‘सामान्य’ बारिश होती है, इसका फैलाव अधिकतर असमान रहा है।

जैसा कि भूजल सर्वेक्षण और विकास एजेंसी के वरिष्ठ भूगर्भ विज्ञानी चंद्रकांत भोयार बताते हैं: “सीमित समय में मूसलाधार बारिश से मिट्टी का क्षरण होता है। लेकिन जब बारिश लगातार होती है, तो यह भूजल के पुनर्भरण में मदद करती है।”

शिंदे अब भूजल पर निर्भर नहीं रह सकते, क्योंकि उनके चार बोरवेल सूख चुके हैं। “हमें 50 फीट की गहराई पर पानी मिल जाता था, लेकिन अब 500 फीट गहरे बोरवेल भी सूख गए हैं।”

इससे अन्य समस्याएं पैदा हो रही हैं। “अगर हम पर्याप्त मात्रा में बुवाई नहीं करेंगे, तो मवेशियों के लिए चारा नहीं होगा,” शिंदे कहते हैं। “पानी और चारे के बिना, किसान अपने पशुधन को बनाए रखने में असमर्थ हैं। मेरे पास 2009 तक 20 मवेशी थे। आज, सिर्फ नौ हैं।”

2014 hailstorm damage from the same belt of Latur mentioned in the story
PHOTO • Nishant Bhadreshwar
2014 hailstorm damage from the same belt of Latur mentioned in the story
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2014 hailstorm damage from the same belt of Latur mentioned in the story
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यह मराठवाड़ा के लातूर जिले में है, जहां छह महीने तक पारा 32 डिग्री सेल्सियस से ऊपर रहता है। इस साल अप्रैल के पहले सप्ताह में ताज़ा ओलावृष्टि हुई जब तापमान 41 से 43 डिग्री के बीच था

शिंदे की मां, कावेरीबाई, जो 95 वर्ष की आयु में भी तेज़-तर्रार और सतर्क हैं, कहती हैं, “लातूर उसी समय से कपास का एक केंद्र था, जब 1905 में लोकमान्य तिलक ने इसे यहां शुरू किया था।” वह अपने पैरों को मोड़े फर्श पर बैठी हैं और उन्हें उठने के लिए किसी मदद की ज़रूरत नहीं है। “इसकी खेती करने के लिए हमारे यहां पर्याप्त वर्षा होती थी। आज, सोयाबीन ने इसकी जगह ले ली है।”

शिंदे खुश हैं कि उनकी मां ने लगभग दो दशक पहले सक्रिय खेती छोड़ दी थी – ओलावृष्टि शुरू होने से पहले। “वे कुछ ही मिनटों के भीतर खेत को तबाह कर देते हैं। सबसे ज्यादा पीड़ित वे हैं जिनके पास बाग हैं।”

इस अपेक्षाकृत बेहतर दक्षिणी भाग में, बाग लगाने वाले विशेष रूप से प्रभावित हुए हैं। “आखिरी ओलावृष्टि इस साल अप्रैल में हुई थी,” मधुकर हुलसुलकर कहते हैं, वह मुझे अपने उस बाग में ले गए जहां पेड़ की टहनियों पर पीले रंग के कई दाग दिखाई दे रहे थे। “मैंने 1.5 लाख रुपये के फल खो दिए। हमने वर्ष 2000 में 90 पेड़ों से शुरूआत की थी, लेकिन आज हमारे पास केवल 50 पेड़ ही बचे हैं।” अब वह बागों को छोड़ने पर विचार कर रहे हैं, क्योंकि “ओलावृष्टि अपरिहार्य बनती जा रही है।”

लातूर में, एक सदी से भी अधिक समय से, फसल के पैटर्न में कई बदलाव हुए हैं। किसी ज़माने में ज्वार और अन्य बाजरे के प्रभुत्व वाला क्षेत्र, जहां मक्का की खेती दूसरे नंबर पर होती थी, वहां 1905 से बड़े पैमाने पर कपास की खेती होने लगी।

फिर 1970 से गन्ना आया, कुछ दिनों के लिए सूरजमुखी, और फिर 2000 से बड़े पैमाने पर सोयाबीन की खेती होने लगी। गन्ना और सोयाबीन का फैलाव काफी शानदार था। वर्ष 2018-19 में, 67,000 हेक्टेयर भूमि पर गन्ने की खेती की गई (वसंतदादा शकर संस्था, पुणे के आंकड़े बताते हैं)। और 1982 में जहां चीनी का एक कारखाने था, वहीं लातूर में अब 11 हैं। नकदी फसलों के कारण बड़ी संख्या में बोरवेल खोदे जाने लगे – इस बात की कोई गिनती नहीं है कि कितने खोदे गए हैं – और भूजल का तेज़ी से दोहन किया जाने लगा। ऐतिहासिक रूप से बाजरे के लिए अनुकूल मिट्टी में 100 से अधिक वर्षों से नकदी फसल की खेती का पानी, मिट्टी, नमी और वनस्पति पर अपरिहार्य प्रभाव पड़ा है।

राज्य सरकार की वेबसाइट के अनुसार, लातूर में अब केवल 0.54 प्रतिशत इलाके में ही वन बचा है। यह पूरे मराठवाड़ा क्षेत्र के 0.9 प्रतिशत के औसत से भी कम है।

Kaveribai
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Madhukar and his son Gunwant walking through their orchards
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बाएं: 95 वर्षीय कावेरीबाई शिंदे याद करती हैं, ‘लातूर कपास का केंद्र हुआ करता था… हमारे पास इसकी खेती करने के लिए पर्याप्त वर्षा हुआ करती थी’। दाएं: मधुकर हुलसुलकर और उनके बेटे गुणवंत – जलवायु के कारण खेती से पूरी तरह दूर जा रहे हैं?

“इन सभी प्रक्रियाओं और जलवायु परिवर्तन के बीच कारण का एक संकीर्ण समीकरण बनाना गलत होगा,” अतुल देउलगांवकर कहते हैं। “और कठोर सबूत के साथ सत्यापित करना मुश्किल है। इसके अलावा, इस तरह के बदलाव बड़े क्षेत्रों में होते हैं, न कि किसी जिले की मानव द्वारा खींची गई सीमाओं के भीतर। मराठवाड़ा में, जिसका लातूर एक छोटा सा हिस्सा है, बढ़ते कृषि-पारिस्थितिक असंतुलन के कारण काफी बड़े बदलाव हो रहे हैं।

“लेकिन इस बड़े क्षेत्र में कई प्रक्रियाओं के बीच कुछ न कुछ आपसी संबंध ज़रूर मौजूद हैं। और यह एक पहेली की तरह है कि फसल में बड़े पैमाने पर बदलाव और भूमि के इस्तेमाल में बड़े परिवर्तन तथा प्रौद्योगिकी के कारण खराब मौसम और ओलावृष्टि देखने को मिल रही है। भले ही मानव गतिविधि की निंदा कारण के रूप में नहीं की जा सकती, लेकिन इसकी वजह से जलवायु असंतुलन निश्चित रूप से बढ़ रहा है।”

इस बीच, अत्यंत खराब मौसम के बढ़ते दिनों से लोग हतप्रभ हैं।

“हर कृषि चक्र किसानों को अधिक तनाव में डालता है,” गुणवंत हुलसुलकर कहते हैं। “किसानों की आत्महत्या के पीछे यह भी एक कारण है। मेरे बच्चों के लिए सरकारी कार्यालय में क्लर्क के रूप में काम करना बेहतर होगा।” जलवायु के साथ खेती के बारे में उनका दृष्टिकोण बदल चुका है।

“कृषि अब तेज़ी से समय, ऊर्जा तथा धन की बर्बादी लगने लगी है,” सुबाष शिंदे कहते हैं। उनकी मां के समय में यह अलग था। “खेती हमारी स्वाभाविक पसंद थी,” कावेरीबाई कहती हैं।

कावेरीबाई को नमस्ते कहते हुए जब मैंने उनसे विदाई ली, तो उन्होंने इसके बदले मुझसे हाथ मिलाया। “पिछले साल, मेरे पोते ने पैसे बचाए और मुझे हवाई जहाज़ की यात्रा कराई,” वह गर्व से हंसते हुए कहती हैं। “जहाज़ में किसी ने मेरा अभिवादन इसी तरह से किया था। मौसम बदल रहा है, मुझे लगा कि हमारे अभिवादन की आदतों में भी बदलाव होना चाहिए।”

कवर फोटो (लातूर में ओलावृष्टि से नुकसान): निशांत भद्रेश्वर।

जलवायु परिवर्तन पर PARI की राष्ट्रव्यापी रिपोर्टिंग, आम लोगों की आवाज़ों और जीवन के अनुभव के माध्यम से उस घटना को रिकॉर्ड करने के लिए UNDP-समर्थित पहल का एक हिस्सा है।

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हिंदी अनुवाद: मोहम्मद क़मर तबरेज़

मोहम्मद क़मर तबरेज़ 2015 से ‘पारी’ के उर्दू/हिंदी अनुवादक हैं। वह दिल्ली स्थित एक पत्रकार, दो पुस्तकों के लेखक, उर्दू समाचारपत्र ‘रोज़नामा मेरा वतन’ के न्यूज़ एडिटर हैं, और ‘राष्ट्रीय सहारा’, ‘चौथी दुनिया’ तथा ‘अवधनामा’ जैसे अख़बारों से जुड़े रहे हैं। उनके पास अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातक तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली से पीएचडी की डिग्री है। You can contact the translator here:

Parth M.N.

पार्थ एमएन 2017 के पारी फेलो हैं। वह 'लॉस ऐंजेलेस टाइम्स' के भारत में विशेष संवाददाता हैं और कई ऑनलाइन पोर्टल पर फ्रीलांस काम करते हैं। उन्हें क्रिकेट और यात्रा करना पसंद है।

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