काजल लता बिस्वास चक्रवात की यादों से अभी भी डरी हुई हैं। हालांकि आइला चक्रवात को सुंदरबन से टकराए 10 साल हो चुके हैं, फिर भी 25 मई 2009 उन्हें अच्छी तरह याद है।

दोपहर से पहले का समय था। “[कालिंदी] नदी का पानी गांव में घुसा और सभी घरों में भर गया,” काजल लता कहती हैं। वह उस दिन अपने गांव, गोबिंदकाटी से लगभग सात किलोमीटर दूर, कुमीरमारी गांव में एक रिश्तेदार के घर पर थीं। “हम में से 40-50 लोगों ने एक नाव में शरण ली, जिसमें हमने पूरा दिन और पूरी रात बिताए। हमने पेड़ों, नावों, मवेशियों और धान को बहते हुए देखा। रात में, हम कुछ भी नहीं देख सकते थे। माचिस की तीलियां तक भीग गई थीं। आसमान में जब बिजली चमकती थी, तभी हम कुछ देख पाते थे।”

अपने घर के बाहर बैठकर दोपहर के भोजन के लिए मछली की सफाई करते हुए, 48 वर्षीय एक किसान, काजल लता अपनी बात को जारी रखते हुए आगे कहती हैं, “उस रात को कभी नहीं भुलाया जा सकता है। पीने के लिए पानी का एक बूंद भी नहीं था। किसी तरह, मैंने एक प्लास्टिक की थैली में बारिश की कुछ बूंदें इकट्ठा कीं, जिससे मैं अपनी दोनों बेटियों और भतीजी के होंठों को गीला करती थी, जो बहुत प्यासी थीं।” इस याद के साथ उनकी आवाज़ कांपने लगती है।

अगली सुबह, अपने गांव तक पहुंचने के लिए उन्होंने एक नाव का सहारा लिया। फिर बाढ़ के पानी में चलते हुए अपने घर पहुंचे। “मेरी बड़ी बेटी तनुश्री, जो उस समय 17 साल की थी, जहां पानी बहुत ज़्यादा था वहां डूबते-डूबते बची। सौभाग्य से, उसने अपनी चाची की साड़ी के पल्लू को पकड़ लिया, जो खुल गया था,” काजल लता कहती हैं, उनकी आंखें उस डर को बयान कर रही हैं जिसका उन्होंने तब सामना किया था।

मई 2019 में, उनका डर फानी चक्रवात के साथ लौट आया। इत्तेफ़ाक़ से, उनकी छोटी बेटी, 25 वर्षीय अनुश्री की शादी भी उसी समय होने वाली थी।

Kajal Lata Biswas cutting fresh fish
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काजल लता बिस्वास, गोबिंदकाटी गांव में अपने घर के बाहर मछली की सफाई करते हुए, चक्रवात के क़रीब आने के आतंक को याद करती हैं; धान उनके गांव की इन झोपड़ियों (दाएं) में रखा हुआ है, जबकि फसल को नुकसान पहुंचा है

शादी 6 मई को तय थी। पंचायत द्वारा लाउडस्पीकर से और सरकार द्वारा रेडियो पर फानी के बारे में घोषणा कुछ दिन पहले ही शुरू हुई थी। “हमारी दुर्दशा और डर की कल्पना कीजिए,” काजल लता कहती हैं। “हम घबरा गए थे कि हवाएं और बारिश सभी तैयारियों को नष्ट कर देंगे। शादी से पहले के दिनों में कुछ बारिश हुई थी। लेकिन शुक्र है कि चक्रवात ने हमारे गांव को प्रभावित नहीं किया,” वह चैन की सांस लेते हुए कहती हैं।

2 मई को, भारत के मौसम विभाग ने आंध्र प्रदेश, ओडिशा (जो सबसे बुरी तरह प्रभावित हुआ) और पश्चिम बंगाल में फानी के आने के बारे में चेतावनी जारी की थी। फानी के बारे में बात करते हुए, 80 वर्षीय किसान और रजत जुबिली गांव के पूर्व शिक्षक, प्रफुल्ल मोंडल, अपनी आवाज़ को कुछ ऊंचा उठाते हैं: “फानी से सुंदरबन बाल-बाल बच गया। हवाओं की तेज़ आवाज़ हमें सुनाई दे रही थी। अगर यह (चक्रवात) हमारे गांव से टकराया होता, तो हम अपने घरों और ज़मीन सहित बर्बाद हो जाते…”

जैसा कि मोंडल और काजल लता दोनों ही इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि सुंदरबन में चक्रवात आम हैं। पश्चिम बंगाल सरकार के आपदा प्रबंधन और नागरिक सुरक्षा विभाग ने दक्षिण और 24 उत्तरी परगना, दोनों जिलों को चक्रवातों के कारण ‘बहुत अधिक क्षति का खतरा वाले क्षेत्रों’ के रूप में वर्गीकृत कर रखा है।

मोंडल का गांव दक्षिण 24 परगना जिले के गोसाबा ब्लॉक में है, और काजल लता का गांव उत्तर 24 परगना जिले के हिंगलगंज ब्लॉक में है। ये दोनों पश्चिम बंगाल में भारत के सुंदरबन में शामिल 19 ब्लॉकों का हिस्सा हैं – उत्तर 24 परगना के 6 ब्लॉक और दक्षिण 24 परगना के 13 ब्लॉक।

भारत और बांग्लादेश में फैला, सुंदरबन एक विशाल डेल्टा है, जिसमें शायद दुनिया का सबसे बड़ा सन्निहित मैनग्रोव जंगल है – लगभग 10,200 वर्ग किलोमीटर में फैला। “सुंदरबन क्षेत्र दुनिया के सबसे बेहतरीन पारिस्थितिक तंत्रों में से एक है...” विश्व बैंक की ‘सुंदरबन के सतत विकास के लिए लचीलेपन का निर्माण’ (Building Resilience for the Sustainable Development of the Sundarbans) नामक 2014 की रिपोर्ट में कहा गया है। “पूरा मैनग्रोव वन क्षेत्र अपनी असाधारण जैव विविधता के लिए जाना जाता है, जिसमें कई लुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी प्रजातियां शामिल हैं जैसे कि रॉयल बंगाल टाइगर, ज्वारनदीमुख में रहने वाले मगरमच्छ, भारतीय अजगर और नदियों में रहने वाली डॉल्फ़िन की कई प्रजातियां। यह भारत में पाई जाने वाली 10 प्रतिशत से अधिक स्तनपायी और 25 प्रतिशत पक्षियों की प्रजातियों का घर है।”

लगभग 4,200 वर्ग किलोमीटर में फैला भारतीय सुंदरबन लगभग 4.5 मिलियन लोगों का घर है, जिनमें से कई गरीबी में जीवन व्यतीत कर रहे हैं, मामूली आजीविका के लिए संघर्ष कर रहे हैं, कठोर इलाके और सख़्त मौसम का सामना कर रहे हैं।

हालांकि इस क्षेत्र में आइला के बाद कोई बड़ा चक्रवात नहीं देखा गया है, फिर भी यहां ऐसे चक्रवातों का खतरा हमेशा बना रहता है। पश्चिम बंगाल सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग के लिए बनाई गई भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, खड़गपुर की 2006 की एक रिपोर्ट बताती है कि राज्य में 1891 से 2004 तक 71 चक्रवाती तूफान आ चुके हैं। उस अवधि में, दक्षिण 24 परगना जिले का गोसाबा ब्लॉक सबसे ज़्यादा प्रभावित रहा, जिसने छह गंभीर चक्रवातों और 19 साधारण चक्रवातों का सामना किया।

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रजत जुबिली गांव में, 80 वर्षीय प्रफुल्ल मोंडल ने कई तूफानों का सामना किया है, लेकिन अब उनका परिवार मौसम के अनिश्चित परिवर्तनों से जूझ रहा है

प्रफुल्ल इस प्रकार आइला से पहले के चक्रवातों को भी याद कर सकते हैं। “मैं 1998 के चक्रवात को नहीं भूल सकता [जिसे आज़ादी के बाद पश्चिम बंगाल का ‘सबसे प्रबल तूफान’ कहा जाता है, आइला से भी मज़बूत, जो कि एक ‘गंभीर चक्रवाती तूफान’ था], जिसकी हवाएं काफ़ी तेज़ और हिंसक थीं। इससे पहले भी, मैं 1988 के चक्रवात को याद कर सकता हूं,” वह कहते हैं।

लेकिन इस तूफानी अतीत के बावजूद, चक्रवाती अवसाद (समुद्र में उष्णकटिबंधीय मौसम की गड़बड़ी, 31-60 किलोमीटर प्रति घंटे की सीमा में, 62-82 किलोमीटर के चक्रवाती तूफान की सीमा के नीचे) पिछले 10 वर्षों में निचले गंगा के डेल्टा में (जहां सुंदरबन स्थित हैं) 2.5 गुना बढ़ गया है, कोलकाता के समुद्र विज्ञानी, डॉ. अभिजीत मित्रा 2019 में प्रकाशित अपनी पुस्तक, भारत में मैनग्रोव जंगलः परितंत्र सेवाओं की खोज (Mangrove Forests in India: Exploring Ecosystem Services), में लिखते हैं। “इसका मतलब है कि चक्रवात अब अक्सर आते हैं,” वह कहते हैं।

कई अन्य अध्ययनों से पता चलता है कि सुंदरबन के आसपास बंगाल की खाड़ी में चक्रवातों की घटनाओं में वृद्धि हुई है। डाईवर्सिटी (Diversity) पत्रिका में 2015 में प्रकाशित एक अध्ययन 1881 और 2001 के बीच इस वृद्धि को 26 प्रतिशत बताता है। और मई, अक्टूबर और नवंबर के दौरान बंगाल की खाड़ी में चक्रवातों पर 1877 से 2005 तक के उपलब्ध आंकड़ों का उपयोग करते हुए, 2007 का अध्ययन बताता है कि पिछले 129 वर्षों में इन गंभीर चक्रवाती महीनों के दौरान यहां तेज़ चक्रवाती तूफानों में काफ़ी वृद्धि हुई है।

इसका कारण एक तरह से समुद्र की सतह के तापमान में वृद्धि को बताया गया है (पृथ्वी विज्ञान और जलवायु परिवर्तन पत्रिका, Journal of Earth Science & Climate Change में प्रकाशित एक लेख में यह बात कही गई है)। ये तापमान भारतीय सुंदरबन में 1980 से 2007 तक प्रति दशक 0.5 डिग्री सेल्सियस बढ़े – जो कि तापमान वृद्धि की विश्व स्तरीय प्रति दशक 0.06 डिग्री सेल्सियस की दर से अधिक है।

इसके कई भयावह नतीजे सामने आए हैं। “सुंदरबन ने पिछली बार 2009 में एक बड़े चक्रवात का सामना किया था,” जादवपुर विश्वविद्यालय, कोलकाता में स्कूल ऑफ ओशनोग्राफिक स्टडीज की प्रोफ़ेसर सुगाता हाज़रा कहती हैं, “बंगाल की उत्तरी खाड़ी में आने वाले चक्रवातों से बार-बार जलभराव और तटबंध टूटने के कारण इस क्षेत्र को नुकसान उठाना पड़ा है।”

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बढ़ते समुद्र तल और समुद्र की सतह के तापमान में वृद्धि, तथा अन्य कई परिवर्तन सुंदरबन के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं

विश्व बैंक की रिपोर्ट कहती है, तटबंध “चक्रवाती तूफानों और समुद्र तल में वृद्धि के खिलाफ रक्षा की प्रणालियों के रूप में सुंदरबन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। डेल्टा के धंसने, समुद्र तल बढ़ने, और जलवायु परिवर्तन के रूप में चक्रवात की तीव्रता में वृद्धि से लोगों और उनके खेतों की उत्पादकता के लिए खतरा पैदा हो गया है और 19वीं सदी में बनाए गए 3,500 किलोमीटर के तटबंधों के क्षय से उन्हें काफी नुकसान पहुंचा है…”

2011 के वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड के एक शोधपत्र का कहना है कि सुंदरबन में सागर द्वीप की वेधशाला में मापा गया 2002-2009 का सापेक्षिक औसत समुद्र तल 12 मिमी प्रति वर्ष या 25 वर्ष के लिए 8 मिमी प्रति वर्ष की दर से बढ़ा।

तापन (वार्मिंग) और संबंधित समुद्र तल में वृद्धि भी मैनग्रोव को प्रभावित कर रही है। ये जंगल चक्रवातों और कटाव से तटीय क्षेत्रों की रक्षा करने में मदद करते हैं, मछली और अन्य प्रजातियों के लिए प्रजनन क्षेत्र के रूप में काम करते हैं, और बंगाल टाइगर का निवास स्थान भी हैं। जादवपुर यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ ओशनोग्राफिक स्टडीज़ द्वारा 2010 का एक शोधपत्र, जिसका शीर्षक है Temporal Change Detection (2001-2008) Study of Sundarban का कहना है कि समुद्र तल में वृद्धि और चक्रवात जंगल के रक़बे को कम करके सुंदरबन के मैनग्रोव के स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहे हैं।

रजत जुबिली गांव के एक मछुआरे, अर्जुन मोंडल, सुंदरबन में मैनग्रोव के महत्व के बारे में गहराई से जानते थे। उन्होंने सुंदरबन रूरल डेवलपमेंट सोसायटी नामक एनजीओ के साथ काम किया। “सभी ने जलवायु परिवर्तन के बारे में सुना है, लेकिन यह हमें कैसे प्रभावित कर रहा है? हमें इसके बारे में और जानने की ज़रूरत है,” उन्होंने मई 2019 में मुझसे कहा था।

29 जून, 2019 को एक बाघ, अर्जुन को उस समय उठा ले गया जब वह पीरखली जंगल में केकड़ा पकड़ रहे थे। सुंदरबन में बाघ लंबे समय से मनुष्यों पर हमला करते रहे हैं, इन हमलों की ये बढ़ती घटनाएं कम से कम आंशिक रूप से, समुद्र तल के बढ़ने से वन भूमि के क्षरण के कारण हो रही हैं, जिसकी वजह से ये बाघ इंसानों की बस्तियों के और क़रीब आते जा रहे हैं।

इस क्षेत्र में बार-बार चक्रवातों के आने से पानी के लवणता के स्तर में भी वृद्धि हुई है, विशेष रूप से केंद्रीय सुंदरबन में, जहां गोसाबा स्थित है। “…समुद्र तल में वृद्धि के साथ-साथ डेल्टा में मीठे पानी के प्रवाह में कमी के (आंशिक) कारण, लवणता में अत्यधिक वृद्धि का पारिस्थितिक तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है,” विश्व बैंक की रिपोर्ट में कहा गया है।

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सुंदरबनों में व्यापक तटबंध, जो खेती और मिट्टी की लवणता को नियंत्रित करने के लिए ज़रूरी हैं, बढ़ते समुद्र तल से तेज़ी से टूट रहे हैं

डॉ. मित्रा द्वारा सह-लिखित एक शोधपत्र सुंदरबन को ‘अत्यधिक खारा’ बताता है। “सुंदरबन के मध्य भाग में समुद्र तल बढ़ने के कारण जल का खारापन बढ़ गया है। यह स्पष्ट रूप से जलवायु परिवर्तन से जुड़ा हुआ है,” डॉ. मित्रा कहते हैं।

अन्य शोधकर्ताओं ने लिखा है कि बिद्याधरी नदी का गाद, हिमालय से ताज़े पानी के प्रवाह को मध्य और पूर्वी सुंदरबन तक आने से रोकता है। शोधकर्ताओं ने भूमि की कटाई, खेती, नालों की कीचड़ का जमाव और मछली पालन के कचरे को गाद के लिए ज़िम्मेदार ठहराया है। 1975 में फरक्का बैराज का निर्माण भी (पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में, गंगा पर) केंद्रीय सुंदरबन की बढ़ती लवणता का एक कारक बना।

रजत जुबिली में मोंडल परिवार उच्च लवणता के प्रभावों को जानता है – उनके पास आइला के बाद तीन साल तक, बेचने के लिए चावल नहीं था। चावल बेचने से होने वाली 10,000-12,000 रुपये की उनकी वार्षिक आय का सफाया हो गया था। “चावल की खेती बंद हो जाने से पूरा गांव खाली हो गया, क्योंकि यहां के पुरुष काम की तलाश में तमिलनाडु, कर्नाटक, गुजरात और महाराष्ट्र चले गए, जहां वे कारखानों या निर्माण स्थलों पर काम करने लगे,” प्रफुल्ल याद करते हैं।

राज्य भर में, आइला ने 2 लाख हेक्टेयर से अधिक फसली क्षेत्र और 60 लाख से अधिक लोगों को प्रभावित किया, 137 लोगों की जान गई और 10 लाख से अधिक घर तबाह हुए। “मेरे गांव में ऐसा कोई भी नहीं था जिसका नुकसान न हुआ हो,” प्रफुल्ल कहते हैं। “मेरा घर और फसल नष्ट हो गई। मैंने 14 बकरियों को खो दिया और तीन साल तक धान की खेती नहीं कर सका। सब कुछ शून्य से शुरू करना पड़ा। वे कठिन वर्ष थे। मैंने जीवनयापन के लिए बढ़ईगीरी और छोटे-मोटे काम किए।”

आइला के कारण लवणता बढ़ने के बाद, काजल लता के परिवार को भी अपनी 23 बीघा (7.6 एकड़) ज़मीन में से छह बीघा ज़मीन बेचनी पड़ी। “दो साल तक घास का एक पत्ता भी नहीं उगा, क्योंकि मिट्टी काफी नमकीन हो चुकी थी। धान भी नहीं उग सकता था। धीरे-धीरे, सरसों, गोभी, फूलगोभी और लौकी जैसी सब्ज़ियां फिर से उग रही हैं, जो हमारी खपत के लिए पर्याप्त हैं, लेकिन बेचने के लिए पर्याप्त नहीं हैं,” वह कहती हैं। “हमारे पास एक तालाब भी था जिसमें अलग-अलग किस्म की मछलियां होती थीं जैसे कि शोल, मागुर, रोहु और हम उन्हें बेचकर एक साल में 25,000-30,000 रुपये कमा सकते थे। लेकिन आइला के बाद, पानी पूरी तरह से नमकीन हो गया, इसलिए अब कोई मछली नहीं बची है।”

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सुंदरबन के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए मैनग्रोव ज़रूरी हैं, लेकिन वे भी धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं

आइला के कारण मिट्टी का क्षरण हुआ – उच्च लवणता और उच्च क्षारीयता सहित – जिसके नतीजे में उत्तर और दक्षिण 24 परगना के अधिकांश हिस्सों धान ठीक से नहीं उगा, यह कहना है 2016 में जर्नल ऑफ़ एक्सपेरिमेंटल बायोलॉजी एंड एग्रीकल्चरल साइंसेज़ (Journal of Experimental Biology and Agricultural Sciences) में छपे एक लेख का। पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन से पता चलता है कि धान को फिर से उगाने के लिए, फॉस्फेट और पोटाश आधारित उर्वरक का उपयोग अनुशंसित स्तरों से ऊपर करना पड़ेगा।

आइला के बाद, उर्वरक का उपयोग बढ़ गया है। केवल तभी हम आवश्यक उपज प्राप्त कर पाएंगे,” प्रफुल्ल के 48 वर्षीय पुत्र, प्रबीर मोंडल कहते हैं। “यह खाने के लिए स्वास्थ्यवर्धक नहीं है, फिर भी हमें इसे खाना पड़ेगा। बचपन में हम जो चावल खाते थे, वह मुझे अभी भी याद है। आप उसे वैसे ही खा सकते थे, जैसा कि वह होता था। अब, इसे सब्ज़ियों के साथ खाने पर भी अजीब सा लगता है।”

उनके पिता के पास 13 बीघा (4.29 एकड़) ज़मीन है, जिसमें प्रति बीघा 9 बस्ता चावल पैदा होता है – एक बस्ता 60 किलो के बराबर होता है। “धान की बुवाई, कटाई और ढुलाई के साथ-साथ खाद की लागत का मतलब है हमने जो खर्च किया है, उस पर हमारी कमाई बहुत कम होती है,” प्रबीर कहते हैं।

2018 के एक शोधपत्र के अनुसार, आइला के बाद सुंदरबन में धान की पैदावार आधा रह गई – प्रति 1.6 हेक्टेयर पर 64-80 क्विंटल से घट कर 32-40 क्विंटल। हालांकि धान का उत्पादन अब आइला से पहले के स्तर पर आ गया है, लेकिन उनका परिवार और गांव के अन्य लोग जून से सितंबर तक पूरी तरह से वर्षा पर निर्भर रहते हैं, प्रबीर कहते हैं।

और यह वर्षा अविश्वसनीय हो गई है। “समुद्र तल में तीव्र वृद्धि और मानसून के देरी से आगमन और उसमें कमी, जलवायु परिवर्तन के दीर्घकालिक प्रभाव हैं,” प्रो. हाज़रा कहती हैं।

कोलकाता के स्कूल ऑफ ओशनोग्राफिक स्टडीज़ में चल रहे शोध का कहना है कि बंगाल की उत्तरी खाड़ी (जहां सुंदरबन स्थित है) में पिछले दो दशकों से एक दिन में 100 मिलीमीटर से अधिक वर्षा अब अक्सर हो रही है। साथ ही, बुवाई के मौसम में, प्रो. हाज़रा कहती हैं, मानसून की बारिस अक्सर कम होती है, जैसा कि इस साल हुआ – 4 सितंबर तक, दक्षिण 24 परगना में लगभग 307 मिलीमीटर कम और उत्तर पूर्वी परगना में लगभग 157 मिमी कम हुई।

ऐसा सिर्फ़ इसी साल नहीं हुआ है – सुंदरबन में कम या ज़्यादा बारिश पिछले कुछ सालों से लगातार हो रही है। दक्षिण 24 परगना में जून से सितंबर तक मानसून की सामान्य बारिश 1552.6 मिमी रही। जिले के 2012-2017 के मानसून के आंकड़ों से पता चलता है कि छह में से चार वर्षों में वर्षा कम हुई थी, जिसमें से सबसे कम वर्षा 2017 (1173.3 मिमी) और 2012 में (1130.4 मिमी) हुई।

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धान की खेती पूरी तरह से वर्षा पर निर्भर है। अगर बारिश नहीं हुई, तो चावल नहीं उगेगा

उत्तर 24 परगना में, इसका उल्टा हुआ है: यानी अधिक वर्षा। यहां जून से सितंबर तक 1172.8 मिमी बारिश होती है। 2012-2017 के मानसून के आंकड़ों से पता चलता है कि इन छह वर्षों में से चार में वर्षा साधारण से ज़्यादा थी – और 2015 में सबसे ज़्यादा, यानी 1428 मिमी बारिश हुई।

“असली परेशानी बेमौसम की बारिश है,” काजल लता कहती हैं। “इस साल फरवरी में बहुत बारिश हुई, मानसून की तरह। यहां तक ​​कि बुजुर्गों का भी कहना था कि उन्हें ऐसा कोई समय याद नहीं है जब फरवरी में इतनी बारिश हुई हो।” उनका परिवार धान की खेती पर आश्रित है, जिसकी बुवाई जून-जुलाई में और कटाई नवंबर-दिसंबर में होती है। “धान की खेती पूरी तरह से वर्षा पर निर्भर है। अगर बारिश नहीं हुई, तो चावल नहीं उगेगा।”

वह कहती हैं कि पिछले चार या पांच वर्षों से, उनके गांव में मानसून के महीनों के अलावा, नवंबर-दिसंबर में भी बारिश हो रही है। इन महीनों के दौरान जो कुछ बारिश आमतौर पर यहां होती है, उनकी तीव्रता धान की फसल को नुकसान पहुंचा सकती है। “या तो ज़रूरत होने पर बारिश नहीं होती या मौसम से अधिक बारिश होती है। इससे फसल नष्ट हो रही है। हर साल हमें लगता है कि इस बार हद से ज़्यादा [बेमौसम] बारिश नहीं होगी। लेकिन बहुत ज़्यादा बारिश हो जाती है और फसल पूरी तरह से नष्ट हो जाती है। इसीलिए हमारे यहां कहावत है, आशाय मोरे चासा [‘आशा किसान को मारती है’]।”

रजत जुबिली गांव में, प्रबीर मोंडल भी चिंतित हैं। “जून और जुलाई के दौरान, [मेरे गांव में] कोई बारिश नहीं हुई। कुछ धान के पत्ते सूख गए। शुक्र है कि [अगस्त में] बारिश आ गई। लेकिन क्या यह काफ़ी होगा? अगर बहुत ज़्यादा बारिश हो जाए और फसल डूब जाए तब क्या होगा?”

स्वास्थ्य देखभालकर्मी के रूप में (उनके पास वैकल्पिक चिकित्सा में बीए की डिग्री है), प्रबीर कहते हैं कि उनके पास आने वाले रोगी भी अक्सर गर्मी की शिकायत करते हैं। “कई लोगों को अब लू लग जाती है। यह किसी भी समय लग सकती है और घातक हो सकती है,” वह बताते हैं।

समुद्र तल के बढ़ते तापमान के अलावा सुंदरबन में भूमि का तापमान भी बढ़ रहा है। न्यूयॉर्क टाइम्स के एक इंटरैक्टिव पोर्टल पर जलवायु और ग्लोबल वार्मिंग के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 1960 में यहां एक साल में 32 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक तापमान वाले जहां 180 दिन हुआ करते थे, वहीं 2017 में ऐसे दिनों की संख्या बढ़कर 188 हो गई। ऐसे दिनों की संख्या सदी के अंत तक 213 से 258 तक हो सकती है।

बढ़ती गर्मी, चक्रवात, अनिश्चित वर्षा, लवणता, लुप्त हो रहे मैनग्रोव इत्यादि से बार-बार लड़ते हुए, सुंदरबन के निवासी हमेशा अनिश्चितता की स्थिति में रहते हैं। कई तूफानों और चक्रवातों के साक्षी, प्रफुल्ल मोंडल चिंतित हैं: “कौन जानता है कि आगे क्या होगा?”

जलवायु परिवर्तन पर PARI की राष्ट्रव्यापी रिपोर्टिंग, आम लोगों की आवाज़ों और जीवन के अनुभव के माध्यम से उस घटना को रिकॉर्ड करने के लिए UNDP-समर्थित पहल का एक हिस्सा है।

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हिंदी अनुवाद: मोहम्मद क़मर तबरेज़

मोहम्मद क़मर तबरेज़ 2015 से ‘पारी’ के उर्दू/हिंदी अनुवादक हैं। वह दिल्ली स्थित एक पत्रकार, दो पुस्तकों के लेखक, उर्दू समाचारपत्र ‘रोज़नामा मेरा वतन’ के न्यूज़ एडिटर हैं, और ‘राष्ट्रीय सहारा’, ‘चौथी दुनिया’ तथा ‘अवधनामा’ जैसे अख़बारों से जुड़े रहे हैं। उनके पास अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातक तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली से पीएचडी की डिग्री है। You can contact the translator here:

उर्वशी सरकार एक स्वतंत्र पत्रकार तथा 2016 की पारी फ़ेलो हैं।

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