खेत के बीच में ईंट और सीमेंट से बने पांच बाई दस फीट के चबूतरे पर लिखा है: ‘चेतन दादराव खोब्रागड़े। जन्म: 8/8/1995। मृत्यु: 13/5/18’। उनके माता-पिता ने इस स्मारक का निर्माण उस स्थान पर किया, जहां उनके बेटे को एक बाघ ने मार डाला था।

चेतन (23) अपनी बड़ी बहन पायल की शादी का इंतज़ार कर रहे थे, फिर खुद अपनी शादी करना चाहते थे। “हमें पता था कि हमारे आसपास के इलाके में एक बाघ है,” 25 वर्षीय पायल कहती हैं। “हम सपने में भी नहीं सोच सकते थे कि वह एक बाघ द्वारा मारा जाएगा, वह भी हमारे अपने ही खेत पर।”

मई की गर्मी में उस दिन शाम के 6 बजे थे। चेतन अपनी गायों के लिए हरा चारा लाने आमगांव में अपने खेत पर गए थे। शाम के 7 बजे तक जब वह घर नहीं लौटे, तो उनके सबसे छोटे भाई साहिल (17) और चचेरे भाई विजय उन्हें ढूंढने निकले। उन्होंने चेतन का हंसिया ज़मीन पर पड़ा देखा। परिवार का पांच एकड़ खेत उनके घर से सड़क पार करके, मुश्किल से 500 मीटर की दूरी पर है, जिसके आगे सागौन और बांस के सूखे और पतझड़ जंगल हैं।

दोनों चिल्लाए, “वाघ, वाघ [बाघ, बाघ]”, और दूसरों को मदद के लिए पुकारने लगे। कुछ दूरी पर, हरे कड्यालू चारे के बीच चेतन का क्षतविक्षत शव पड़ा था। वह उस बाघ द्वारा मारा गया था, जिसके बारे में पूरा गांव जानता था कि वह आसपास के इलाके में ही है।

“हमने बाघ को जंगल में जाते हुए देखा था,” विजय खेत से सटे जंगलों की ओर इशारा करते हुए कहते हैं। वह पूर्ण विकसित बाघ था जो शायद भूखा और प्यासा था, वह याद करते हैं।

सामूदायिक भूमि का सिकुड़ना

इस छोटे से समुदाय के सामाजिक और राजनीतिक कार्यों का नेतृत्व करने वाले एक युवक की मौत ने आमगांव (स्थानीय लोग इसे आमगांव-जंगली कहते हैं) को एक भयावह और अंधकारमय चुप्पी में डूबो दिया। बारिश होने पर भी खेत बंजर ही रहे, क्योंकि लोग खेतों में जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे।

वर्धा जिले के सेलू तालुका का गांव, बोर टाइगर रिज़र्व के बफ़र ज़ोन में स्थित है। बफ़र में, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत, चरागाह या सामूदायिक भूमि के उपयोग, निर्माण और चराई पर प्रतिबंध है। यह संरक्षित वनों के कोर (या अक्षक) एरिया जहां मानव प्रवेश को वन विभाग द्वारा विनियमित किया जाता है, और क्षेत्रीय वनों या बफ़र से बाहर के इलाक़ों के बीच का एक क्षेत्र है जिनमें गांव मौजूद हैं।

बोर रिज़र्व, देश के नवीनतम और सबसे छोटे अभयारण्य में से एक है जो नागपुर से लगभग 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसे जुलाई 2014 में टाइगर रिज़र्व बनाया गया, जो केवल 138 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र को कवर करता है।

The memorial to Chetan Khobragade in Amgaon. Right: Dadarao Khobragade stands where his son was mauled by a tiger on their farm in Wardha district
PHOTO • Jaideep Hardikar
The memorial to Chetan Khobragade in Amgaon. Right: Dadarao Khobragade stands where his son was mauled by a tiger on their farm in Wardha district
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बाएं: आमगांव में चेतन खोब्रागड़े का स्मारक। दाएं: दादाराव खोब्रागड़े वर्धा जिले में अपने खेत पर उस जगह खड़े हैं जहां उनके बेटे को एक बाघ ने मार डाला था

बफर और अधीनस्थ क्षेत्रों के कई गांवों की तरह, लगभग 395 लोगों  की आबादी वाला आमगांव (जनगणना 2011), महाराष्ट्र के सुदूर पूर्वी क्षेत्र, विदर्भ में इंसानों और बाघ के बीच टकराव का एक केंद्र बन गया है। यहां 22,508 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में जंगल (2014 के फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के डेटा के अनुसार), छह टाइगर रिज़र्व और तीन महत्वपूर्ण अभयारण्य हैं।

“लेकिन अतीत में कभी भी हमने ऐसी त्रासदी नहीं देखी थी,” आमगांव के पूर्व सरपंच, 65 वर्षीय बबनराव येवले कहते हैं। उनका संबंध खानाबदोश पशुपालक गोवली (वे खुद को नंद-गवली कहते हैं) समुदाय से है, जो गवलाऊ नस्ल की देशी गाय पालते हैं। वह बताते हैं कि उनका समुदाय वर्षों से अपनी गायों को चरने के लिए जंगलों में छोड़ देता है, यह जानते हुए कि मांसाहारी जानवर उनमें से कुछ को मार देंगे। “बाघों के लिए कुछ बछड़े छोड़ देने की हमारी प्रथा रही है...” वह कहते हैं।

नंद-गवाली साल में छह महीने, गर्मियों से लेकर दीपावली के बाद तक, अपने मवेशियों को चरने के लिए जंगल में छोड़ देते हैं और हर दिन उन्हें देखने के लिए जाते हैं। उन्हें सर्दियों में वापस घर तब लाया जाता है, जब गांव में उनके लिए चारा और पानी उपलब्ध रहता है।

लेकिन बोर, जिसे पहली बार जून 1970 में वन्यजीव अभयारण्य के रूप में अधिसूचित किया गया था, जुलाई 2014 में भारत का 47वां और महाराष्ट्र का 6वां टाइगर रिज़र्व घोषित करने के बाद इसमें इंसानों के निवास और आवाजाही को प्रतिबंधित कर दिया गया। आमगांव चूंकि बफ़र ज़ोन में है, इसलिए वन विभाग ने लोगों के लिए सख्त नियम बना दिये हैं, जिसमें मवेशियों की आवाजाही और चराई पर प्रतिबंध शामिल है।

“हमारे और जंगलों के बीच एक सहजीवी संबंध था,” येवले कहते हैं। “बोर को टाइगर रिज़र्व घोषित करने के बाद यह रिश्ता टूट गया।” हमें लगता है कि जंगल और वन्यजीव हमारे पर्यावरण का हिस्सा नहीं हैं।”

बाघों की बढ़ती आबादी

2014 के अखिल भारतीय बाघ अनुमान सर्वेक्षण (जिसे बाघ की जनगणना भी कहा जाता है) से पता चला कि देश में बाघों की संख्या काफ़ी बढ़ी है, 2010 में यह संख्या 1,706 थी जो 2014 में बढ़ कर 2,226 हो गई। बाघों की संख्या 2006 में केवल 1,411 थी। इस डेटा में गैर-संरक्षित क्षेत्रों में रहने वाले बाघ शामिल नहीं हैं, जैसे कि बोर रिज़र्व के आसपास रहने वाले बाघ, जिनकी संख्या 2014 में आठ थी।

वन और पर्यावरण मंत्रालय द्वारा 2011 की टाइगर एस्टीमेशन रिपोर्ट ने चेतावनी दी कि इंसानों और बाघों के बीच टकराव बढ़ सकता है, इस तथ्य की ओर इशारा करते हुए कि भारत भर में बाघों के कुल जितने भी इलाक़े हैं उनमें से केवल 10 प्रतिशत इलाक़े में ही प्रजनन करने वाले बाघ केंद्रित होकर रह गए हैं। बाघों की 2018 की गणना अभी जारी है और अधिकारियों को उम्मीद है कि उनकी संख्या और बढ़ी होगी, जो इंसानों और बाघों के बीच टकराव में वृद्धि का भी संकेत है।

बाघों की बढ़ती आबादी अपने इलाक़ों से निकलकर गांवों में फैलने लगी है। मार्च से जून 2018 के आरंभ तक, बाघों के हमलों में तेज़ी आई - पूरे विदर्भ में ऐसे कम से कम 20 हमले हुए। ये सभी घटनाएं संरक्षित जंगलों के बाहर हुईं। यह समस्या पहले नागपुर से लगभग 150 किलोमीटर दूर, चंद्रपुर जिले के ताडोबा अंधारी टाइगर रिज़र्व (टीएटीआर) के आसपास के क्षेत्रों तक ही सीमित थी, जो अब विदर्भ के अन्य भागों में भी फैल चुकी महसूस होती है।

टीएटीआर के आसपास के गांवों के अलावा, नागपुर जिले के उत्तरी क्षेत्र में स्थित जंगलों; यवतमाल के घने जंगलों; और वर्धा के बोर टाइगर रिज़र्व के आसपास से बाघ के हमलों की सूचना मिली है। आख़िरी सूचना हाल ही में मध्य नवंबर में मिली थी, जब बाघ ने ब्रह्मपुरी शहर के पास के एक गांव में एक 60 वर्षीय महिला की हत्या कर दी थी।

ये सभी हमले खेतों में या गांवों से सटे जंगल में अचानक, आश्चर्यजनक, घात लगाकर किए गए थे।

Damu Atram, a Kolam Adivasi farmer in Hiwara Barsa village, got eight stitches on his skull and five on the neck after a tiger attack in May 2018
PHOTO • Jaideep Hardikar
Damu Atram, a Kolam Adivasi farmer in Hiwara Barsa village, got eight stitches on his skull and five on the neck after a tiger attack in May 2018
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मई 2018 में बाघ के हमले के बाद हिवरा बारसा गांव के कोलाम आदिवासी किसान, दामू अत्राम को सिर में आठ और गर्दन पर पांच टांके लगे थे

पश्चिमी विदर्भ में, यवतमाल जिले के ज़री-जामनी तालुका के हिवरा बारसा गांव में रहने वाले कोलाम आदिवासी, दामू अत्राम मई 2018 में अपने खेत पर काम कर रहे थे, तभी एक बाघ ने उन पर हमला कर दिया। गांव को लोगों की मदद से वह इस हमले में बच गए और केवल उनके सिर और गर्दन पर चोट आई थी। उन्हें समय पर सहायता मिल गई - उनके सिर में आठ और गर्दन पर पांच टांके लगे - और वह बाघ की कहानी सुनाने के लिए बच गए। “मुझे चक्कर आता है और सिर भारी रहता है,” अत्राम मुझसे कहते हैं। “जब मैं सुबह अपने खेत पर काम कर रहा था तो वह पीछे से आया। मुझे पता नहीं था कि आसपास बाघ है। वह मुझ पर हावी हो गया, लेकिन जब मैं चिल्लाया तो वह झाड़ियों में भाग गया।”

यहां से कुछ किलोमीटर दूर, नागपुर जिले के रामटेक तालुका के पिंडकपार गांव में 25 वर्षीय गोंड आदिवासी किसान, बीरसिंह बिरेलाल कोदवते अभी तक बाघ के हमले को भूल नहीं पाए हैं। मई की शुरुआत में एक दिन कोदवते अपने तीन वर्षीय बेटे विहान के साथ, मोटरबाइक से तेंदू के पत्ते इकट्ठा करने के लिए लंबी यात्रा पर निकले, इसे वह बाद में सुखाकर बीड़ी के ठेकेदारों को बेच देते। कोदवते बांस और सागौन के घने जंगलों से घिरे बावनथडी जलाशय के समीप अपने खेत पर रहते हैं। लेकिन उन्होंने कभी बाघ का सामना नहीं किया था। यह क्षेत्र पेंच बाघ अभयारण्य के आसपास, और गोंडिया में नवेगांव-नागाझिरा टाइगर रिज़र्व तक फैले गलियारे में है।

“बाघ जंगल में सड़क के किनारे एक पुलिया में छिपा हुआ था। जब हम वहां से गुज़रे, तो वह हमारी बाइक पर कूदा और हमें अपने पंजों से मारा। हम भाग्यशाली थे कि उसके जबड़े से बच गए,” बीरसिंह याद करते हुए कहते हैं। “मैं स्तब्ध रह गया, वह एक बड़ा बाघ था।” दोनों ही ज़मीन पर गिर गए थे। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद वह किसी तरह उठे, अपनी बाइक को फिर से स्टार्ट किया और अपने बेटे के साथ घर वापस आ गए।

पिता और पुत्र दोनों ने नागपुर के सरकारी अस्पताल में, चोट और भय से उबरते हुए, एक सप्ताह बिताया। जब मैं बीरसिंह से मिला, तो उनके घाव ताज़ा थे - आंखें सूजी हुईं और बाघ के नाखुनों से उनका कान छिला हुआ था। उनके चेहरे के बाईं ओर और सिर में गहरी चोटें आई थीं। विहान को, उसकी मां सुलोचना ने बताया, “सिर में आठ टांके लगे थे। वह बच गया।”

तीव्र होती लड़ाई

चंद्रपुर जिले में टीएटीआर के आसपास सिंदेवाही और चिमूर तालुका में, जनवरी 2018 से अभी तक बाघ के हमलों में कम से कम 20 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि कई अन्य घायल हुए हैं। यह 2004-05 में होने वाली मौतों की याद ताज़ा कर रहा है। हाल के अधिकांश हमले जंगलों के आसपास के गांव या उनसे सटे खेतों पर हुए हैं।

गोंड आदिवासी किसान महादेव गेडाम (65), 4 जून को जब अपने खेत से ईंधन की लकड़ी लाने गए थे, तो एक बाघ ने उन पर हमला कर दिया। उनका खेत जंगल के एक टुकड़े से सटा हुआ है। ग्रामीणों ने बताया कि गेडाम ने शायद पेड़ पर चढ़ने की कोशिश की थी, लेकिन हो सकता है कि जानवर ने उन्हें खींचकर मार दिया हो।

सिंदेवाही तालुका के मुरमाडी गांव में, पांच महीने के भीतर यह दूसरी मौत थी। जनवरी 2018 को इसी तरह के एक हमले में, 60 वर्षीय एक अन्य गोंड आदिवासी महिला गीताबाई पेंडाम की मौत हो गई थी, जब वह ईंधन की लकड़ी इकट्ठा करने के लिए जंगल में गई थीं।

Ramabai Gedam (centre) in Murmadi, Chandrapur. Her husband Mahadev was the second victim of tiger attacks in two months in this village
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मुरमाडी, चंद्रपुर में रमाबाई गेडाम (बीच में)। उनके पति महादेव इस गांव में दो महीने के भीतर होने वाले बाघ के हमले में दूसरे शिकार थे

घटनास्थल गांव से बमुश्किल 500-800 मीटर की दूरी पर, सड़क के उस पार, जंगल के घने हिस्से में है जो बाघों को एक पतला गलियारा प्रदान करता है।

गेडाम की मृत्यु से दो सप्ताह पहले, पड़ोसी गांव किन्ही के जंगल में बाघ द्वारा क्षतविक्षत किया गया 20 वर्षीय मुकुंदा भेंडारे का शव मिला था। 6 जून को, टीएटीआर के उत्तरी भाग में, चिमूर तालुका में एक बाघ ने खेत पर काम कर रही चार महिलाओं के एक समूह पर हमला कर दिया, जिसमें से एक की मौत हो गई और बाकी तीन घायल हो गई थीं।

“मेरे इलाके में जंगल का वह हिस्सा जहां हाल के अधिकांश हमले हुए हैं, वहां 2-3 युवा बाघ रहते हैं,” एक युवा वन-रक्षक, स्वप्निल बडवाइक ने मुरमाडी की यात्रा के दौरान हमें बताया। “हम नहीं जानते कि मनुष्यों पर हमला करने वाला यह यह वही बाघ है या अलग-अलग हैं।”

यह पुष्टि करने के लिए कि हमलों में कितने बाघ शामिल थे, उनकी लार (मानव शरीर से ली गई) और अन्य नमूनों को सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी, हैदराबाद भेजा गया है, जो भारतीय वैज्ञानिक अनुसंधान परिषद का एक प्रमुख संस्थान है। यदि बाघ समस्या बना, तो वन विभाग आमतौर पर उसे मारने का फैसला करता है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि इस साल सूखे ने स्थिति बिगाड़ दी है। गर्मियों में आमतौर पर लोग, तेंदू के पत्ते इकट्ठा करने जंगल में जाते हैं। यह तब भी होता है जब बाघ पानी और शिकार की तलाश में घूम रहे होते हैं, क्योंकि दोनों चीज़ें संरक्षित क्षेत्र के बाहर दुर्लभ होती जा रही हैं। और बड़ी संख्या में युवा बाघ (जो अभी तीन साल से कम उम्र के हैं) अपना इलाक़ा बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

Still to come to terms with the sudden attack on him and his son, Beersingh Kodawate and Vihan at their home in Pindkapar village in Nagpur district
PHOTO • Jaideep Hardikar
Still to come to terms with the sudden attack on him and his son, Beersingh Kodawate and Vihan at their home in Pindkapar village in Nagpur district
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नागपुर जिले के पिंडकपार गांव में अपने घर पर बीरसिंह कोदवते और उनका बेटा, विहान। दोनों ही बाघ के अचानक हमले को अभी तक भूल नहीं पाए हैं

टीएटीआर अब पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र नहीं रहा। अपने इलाक़े में इंसानों की बढ़ती आबादी के बीच, जंगली जानवरों के अस्तित्व की यह लड़ाई हर गुजरते साल के साथ नाटकीय और खूनी रूप धारण करती जा रही है।

महाराष्ट्र में 2010 से जुलाई 2018 तक, वन्यजीवों के हमलों में लगभग 330 लोग मारे गए हैं। ये हमले ज्यादातर बाघ और तेंदुए द्वारा किए गए। महाराष्ट्र वन विभाग की वन्यजीव शाखा द्वारा संकलित आंकड़ों के अनुसार, 1,234 लोग गंभीर रूप से घायल हुए और 2,776 लोगों को मामूली चोटें आईं। यह डेटा पूरे राज्य से इकट्ठा किया गया है, लेकिन इनमें से अधिकतर घटनाएं विदर्भ के टाइगर रिज़र्व और अभयारण्यों के आसपास हुई हैं।

विदर्भ में, इसी अवधि में, संगठित गिरोहों द्वारा कम से कम 40 बाघों का शिकार किया गया। पिछले 10 वर्षों में वन विभाग द्वारा चार ‘समस्या’ बन चुके बाघों को मार दिया गया, कई अन्य को पकड़कर नागपुर और चंद्रपुर के चिड़ियाघरों या बचाव केंद्रों में भेज दिया गया, और कई अन्य को मौत के घाट उतारा जा चुका है।

बिखरते जंगल, बढ़ता गुस्सा

इस टकराव के दो मुख्य कारण हैं, महाराष्ट्र के मुख्य वन संरक्षक प्रमुख (वन्यजीव) अशोक कुमार मिश्रा कहते हैं: “एक तरफ, बाघों की आबादी हाल के संरक्षण प्रयासों के कारण बढ़ रही है, जिसमें उनके संगठित शिकार पर कड़ी नज़र रखना भी शामिल है। दूसरी ओर, मानवजनित उच्च दबाव है, जिसमें वनों पर बढ़ती निर्भरता और बढ़ती मानव जनसंख्या शामिल है।”

“मेरे पास ऐसी कोई जानकारी नहीं है कि शिकारियों का कोई संगठित गुट मौजूद है, खासकर 2013 के बाद [जब वन विभाग ने शिकारियों के खिलाफ़ गश्त को तेज़ कर दिया था],” नागपुर के एक बाघ विशेषज्ञ, नितिन देसाई का कहना है, जो वाइल्डलाइफ़ प्रोटेक्शन सोसाइटी ऑफ इंडिया के साथ काम कर रहे हैं। इन इलाक़ों में पांच साल के अंदर बाघों को बड़े पैमाने पर ग़लत तरीक़े से नहीं मारा गया है, वह आगे कहते हैं। इससे बाघों की आबादी के प्राकृतिक विकास में मदद मिली है।

“इन क्षेत्रों में पहले अगर 60 बाघ होते थे, तो उसी इलाक़े में आज 100 होंगे। वे आख़िर कहां जाएंगे? हम उसी क्षेत्र में बाघों की बढ़ती आबादी का प्रबंधन कैसे करेंगे? हमारे पास कोई योजना नहीं है,” देसाई बताते हैं।

और इंसानों के साथ बाघों के टकराव को सीमा के संदर्भ में देखा जाता है: विदर्भ के जंगल, बल्कि मध्य भारत के सभी जंगल, सड़कों सहित कई विकास परियोजनाओं के कारण तेज़ी से खंडित हो रहे हैं।

Beersingh's father-in-law Babulal Atram and elder son Vivek in Pindkapar village, which is located along the backwaters of Nagpur district's Bawanthadi dam, around which are the forests adjoining the Pench tiger reserve
PHOTO • Jaideep Hardikar
Beersingh's father-in-law Babulal Atram and elder son Vivek in Pindkapar village, which is located along the backwaters of Nagpur district's Bawanthadi dam, around which are the forests adjoining the Pench tiger reserve
PHOTO • Jaideep Hardikar

बीरसिंह के ससुर बाबूलाल अत्राम और बड़ा बेटा विवेक, पिंडकपार गांव में। यह गांव नागपुर जिले के बावनथडी बांध के समीप है, जिसके आसपास पेंच टाइगर रिज़र्व से सटे जंगल हैं

मिश्रा कहते हैं कि बाघों के आवास सिकुड़ गए हैं या खंडित हो गए हैं, जानवरों के पारंपरिक गलियारे टूट गए हैं, जिससे उन्हें घूमने की कोई जगह नहीं मिल रही है। ऐसे में आप टकराव के अलावा और क्या उम्मीद करते हैं? मिश्रा सवाल करते हैं। “यदि हमने अपने प्रयासों पर अंकुश नहीं लगाया, तो यह और भी गहराता चला जाएगा।”

उनका तर्क, पूर्वी विदर्भ के बाघों के इलाक़े में वनों के विखंडन को समझने के लिए, उनके कार्यालय द्वारा देहरादून के भारतीय वन्यजीव संस्थान से कराए गए अध्ययन पर आधारित है। यह पिछले अध्ययनों का विस्तार था, जिसमें वनों के विभाजन को बाघों और वन्यजीव संरक्षण के लिए एक बड़ी चुनौती बताया गया है।

फ़ॉरेस्ट फ़्रैग्मेंट्स इन ईस्टर्न विदर्भ लैंडस्केप, महाराष्ट्र – द टिग-सॉ पज़ल शीर्षक रिपोर्ट जुलाई 2018 में जारी की गई थी। इसने बताया कि इस पूरे क्षेत्र में जंगलों के केवल छह हिस्से हैं - प्रत्येक 500 वर्ग किलोमीटर से अधिक – जिन्हें बाघों के रहने के लिए अनुकूल कहा जा सकता है। उनमें से चार गढ़चिरौली में हैं, जहां अब बाघों की आबादी नहीं हैं, जबकि पहले यह ज़िला टकराव का केंद्र हुआ करता था।

वनों के अधिकतर अन्य हिस्से 5 वर्ग किलोमीटर से भी छोटे हैं और बाघों के रहने के लिए अनुकूल नहीं हैं।

भारतीय उपमहाद्वीप जैव-क्षेत्र में, जिसमें नेपाल और बांग्लादेश भी शामिल हैं, पिछले अध्ययनों ने 59 ‘बाघ संरक्षण इकाई’ (Tiger Conservation Unit, TCU) की पहचान की थी, जो 325,575 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र को कवर करते हैं, जिनमें से केवल 54,945 वर्ग किलोमीटर (16.87 प्रतिशत) ही संरक्षित हैं, डब्ल्यूआईआई रिपोर्ट कहती है। मध्य भारतीय भूदृश्य (Central Indian Landscape, CIL) में टीसीयू के 107,440 वर्ग किलोमीटर शामिल हैं, जिनमें से 59,465 वर्ग किलोमीटर प्रथम और द्वितीय श्रेणी के टीसीयू हैं – जो संरक्षण के दृष्टिकोण से प्राथमिकता वाले आवासों का संकेत देते हैं।

सीआईएल और पूर्वी घाटों की पहचान, बाघ संरक्षण के लिए वैश्विक प्राथमिकता वाले भूदृश्य के रूप में की गई है, डब्ल्यूआईआई की रिपोर्ट कहती है। इस क्षेत्र में बाघों की वैश्विक आबादी का लगभग 18 प्रतिशत हिस्सा रहता है। 2016 के वैश्विक आंकड़ों के अनुसार, 3,900 बाघ वनों में (और अज्ञात संख्या कैद में) बचे हैं। मध्य भारत में बाघों की आबादी अत्यधिक खंडित गलियारों और कृषि के कारण कम हुई है, रिपोर्ट में कहा गया है।

डब्ल्यूआईआई की रिपोर्ट कहती है: “पूर्वी विदर्भ में वनों का कुल क्षेत्र 22,508 वर्ग किलोमीटर है, जो कि कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 35 प्रतिशत है, जहां संरक्षित क्षेत्र के अंदर और बाहर बाघों की आबादी लगभग 200 या उससे अधिक है।” इस क्षेत्र को 45,790 किलोमीटर लंबी सड़क ने (मार्च 2016 तक) विभाजित कर दिया है जिसमें राष्ट्रीय राजमार्ग, राज्य राजमार्ग, जिले की सड़कें और गांव की सड़कें शामिल हैं, रिपोर्ट में कहा गया है। सड़कों के कारण हुए विखंडन ने वनों के 517 नए छोटे हिस्से बनाए हैं जो एक वर्ग किलोमीटर से भी कम हैं और कुल 246.38 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को कवर करते हैं।”

चंद्रपुर जिले में विशेष रूप से, बुनियादी ढांचे में उछाल देखा जा रहा है - विदर्भ के बाकी हिस्सों में भी यही हो रहा है।

Chetan Khobragade's siblings, cousins and parents.  His death sank the people of Amgaon into a fearful and gloomy silence
PHOTO • Jaideep Hardikar
Chetan Khobragade's siblings, cousins and parents.  His death sank the people of Amgaon into a fearful and gloomy silence
PHOTO • Jaideep Hardikar

चेतन खोब्रागड़े के भाई-बहन, चचेरे भाई और माता-पिता। उनकी मृत्यु ने आमगांव के लोगों को एक भयावह और अंधकारमय ख़ोमोशी में डूबो दिया

इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि विदर्भ में सड़क निर्माण सहित बुनियादी ढांचा तेज़ी से विकसित हो रहा है: महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस नागपुर से हैं; वित्त और वन मंत्री सुधीर मुनगंटीवार चंद्रपुर से हैं; ऊर्जा मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले नागपुर ग्रामीण से हैं; केंद्रीय भूतल परिवहन और जहाजरानी मंत्री नितिन गडकरी भी नागपुर से हैं।

लेकिन इन नेताओं में से किसी को भी यह एहसास नहीं है कि विकास से वन्यजीवों को कितना नुकसान हो रहा है, खासकर बाघों को, जिन्हें नए क्षेत्रों की तलाश में संरक्षित जंगलों से बाहर निकलने के लिए निकटवर्ती गलियारों की आवश्यकता है।

चार-लेन वाली सीमेंट की दो सड़कें - पूर्व-पश्चिम चार-लेन राजमार्ग (NH-42) और उत्तर-दक्षिण गलियारा (NH-47) जो नागपुर से गुज़रता है, ने विदर्भ के वन क्षेत्र को विभाजित कर दिया है। इतना ही नहीं, महाराष्ट्र सरकार चंद्रपुर जिले में टीएटीआर के आर-पार जाने वाले राज्य राजमार्गों को चौड़ा कर रही है।

इसके अलावा, पिछले एक दशक में भंडारा जिले के गोसेखुर्द के बड़े बांध से दाहिने किनारे को लगती हुई 80 किलोमीटर लंबी नहर बनाई गई है, जो टीएटीआर से निकलने वाले पूर्व-पश्चिम गलियारों के बीच से गुज़रती हुई पश्चिम में नवेगांव-नागझिरा टाइगर रिज़र्व तक फैली हुई है।

“इंसानों से ज्यादा, विकास परियोजनाओं ने विदर्भ में बाघ के प्राकृतिक गलियारों और फैलाव वाले मार्गों को छीना है,” चंद्रपुर में इको-प्रो नामक एक एनजीओ चलाने वाले संरक्षण कार्यकर्ता, बंडू धोत्रे कहते हैं।

इंसानों की मौत, मवेशियों की मौत, बाघों की मौत और बाघों के साथ मुठभेड़ों की संख्या वैसे तो कागज़ पर लगभग स्थिर है, लेकिन ज़मीनी स्थिति बिल्कुल अलग है। और जनता का गुस्सा बढ़ता जा रहा है।

उदाहरण के लिए, बाघ के आश्चर्यजनक हमले में चेतन खोब्रागड़े की मौत के बाद, टाइगर रिज़र्व के आसपास के लगभग 50 गांवों में, वन विभाग के खिलाफ़ पूरे मई विरोध प्रदर्शन चलता रहा। सड़कों पर विरोध प्रदर्शन हुआ, गांवों के आसपास रैलियां निकाली गईं और वर्धा शहर में जिला संरक्षक के कार्यालय के सामने प्रदर्शन किया गया। ग्रामीणों की एक मांग यह भी थी कि उन्हें टाइगर रिज़र्व से दूर, कहीं और बसाया जाए।

ताडोबा अंधारी टाइगर रिज़र्व के आसपास भी लंबे समय से इसी तरह का विरोध प्रदर्शन चल रहा है। इंसानों और बाघों की यह लड़ाई जारी है, जिसका कोई अंत नहीं दिख रहा है।

इस लेख के अन्य संस्करण मूल रूप से मोंगाबे और बीबीसी मराठी पर जुलाई 2018 में प्रकाशित किए गए हैं।

इस श्रृंखला के अन्य लेख:

टी-1 बाघिन के क्षेत्र में: हत्या का वृत्तांत

‘मैं जब उन्हें घर वापस देखती हूं, तो बाघ का धन्यवाद करती हूं’

बाघिन टी-1 के हमलों और आतंक के निशान

हिंदी अनुवाद: मोहम्मद क़मर तबरेज़

मोहम्मद क़मर तबरेज़ 2015 से ‘पारी’ के उर्दू/हिंदी अनुवादक हैं। वह दिल्ली स्थित एक पत्रकार, दो पुस्तकों के लेखक हैं, और ‘रोज़नामा मेरा वतन’, ‘राष्ट्रीय सहारा’, ‘चौथी दुनिया’ तथा ‘अवधनामा’ जैसे अख़बारों से जुड़े रहे हैं। उनके पास अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातक तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली से पीएचडी की डिग्री है। You can contact the translator here:

Jaideep Hardikar

जयदीप हर्डीकर नागपुर स्थित पत्रकार तथा लेखक, और पारी के कोर टीम (core team) मेम्बर हैं।

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