आपके एक एकड़ खेत में लगी ज्वार कुछ ही समय में कैसे और क्यों गायब हो जाती है? “दो साल में यह पहली बार था जब मैं फसलों के मौसम में एक सप्ताह के लिए अपने गांव से बाहर चला गया। उसी दौरान, वे सब कुछ चट कर गईं,” आनंद सालवी कहते हैं। ‘वे’ गौर (bos gaurus, जिसे कभी-कभी भारतीय बायसन भी कहा जाता है) का एक झुंड है – दुनिया में जीवित सबसे विशाल गोवंश। नर गौर की ऊंचाई खड़ा होने पर कंधे तक, 6 फीट से अधिक और वज़न 500 से 1,000 किलोग्राम के बीच हो सकता है।

महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के राधानगरी वन्यजीव अभयारण्य में सामान्य रूप से शांतिपूर्ण रहने वाले ये विशालकाय जानवर राजमार्गों पर निकल रहे हैं और अपने आसपास के खेतों पर धावा बोल रहे हैं।

“मेरे खेत की रखवाली करने वाला कोई नहीं था,” दुखी सालवी, राक्षी गांव में कहते हैं। “सौभाग्य से, मैं अपने एक एकड़ गन्ने (लगभग 80 टन गन्ने) को बचाने में सफल रहा।” तो आप 1,000 किलो गोमांस के ढेर से कुछ भी कैसे ‘बचाते’ हैं? पटाखों से।

दो साल पहले, सालवी ने हर रात खेतों में सोना शुरू कर दिया। “हम रोज़ाना रात को 8 बजे आते हैं और 4 बजे भोर में यहां से जाते हैं, जब सभी गावा (गौर के लिए स्थानीय शब्द) चली जाती हैं,” वह बताते हैं। “और हम रात में खेतों में पटाखे फोड़ते हैं।” इससे भैंसें डर जाती हैं और उनके पांच एकड़ खेत में घुसती नहीं, वह कहते हैं। उनके कई पड़ोसी भी ऐसा ही करते हैं। पन्हाला तालुका के राक्षी गांव में कम से कम दो साल से ये बायसन फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं।

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सिकुड़ती जा रही सावराई साडा झील, अभयारण्य में जानवरों और पक्षियों के लिए पानी के मुख्य स्रोतों में से एक है। (फोटो: संकेत जैन/PARI)

“हम सीज़न में उन पटाखों को खरीदने पर लगभग 50 रुपये रोज़ाना ख़र्च करते हैं,” सालवी की पत्नी सुनीता कहती हैं। जो खेती की लागत में एक नए तत्व को जोड़ता है। “किसानों का रात में खेतों में सोना भी एक जोखिम है,” वह कहती हैं। उस अवधि में खेतों में अन्य वन्यजीव भी सक्रिय रहते हैं। उदाहरण के लिए, सांप।

लोगों का मानना ​​है कि भैंसें जल्द ही यह पता लगा लेंगी कि पटाखों से उन्हें कोई नुकसान नहीं होने वाला है। इसलिए राधानगरी तालुका के कुछ किसानों ने विद्युतीकृत बाड़ लगाना शुरू कर दिया है। “लेकिन वे इसकी भी आदी होती जा रही हैं,” राधानगरी स्थित वन्यजीव एनजीओ, बायसन नेचर क्लब के सह-संस्थापक सम्राट केरकर कहते हैं। “हमने देखा है कि गौर अपने खुरों या पैरों को धीरे से बाड़ पर रखते हैं यह चेक करने के लिए कि क्या यह झटका देता है। पहले वे इंसानों से डरते थे, लेकिन अब वे हमें देखकर इतनी आसानी से नहीं भागते।”

“हम गावा को दोष नहीं देते,” सुनीता कहती हैं। “यह वन विभाग की गलती है। जंगलों का रख-रखाव अगर ठीक से नहीं किया जाएगा, तो जानवर बाहर निकलेंगे ही।”

गौर भैंसें तेज़ी से वन्यजीव अभयारण्य से बाहर आ रही हैं – भोजन और पानी की तलाश में। उन्हें अन्य चीज़ों के अलावा कारवी के पत्तों (strobilanthes callosa) की तलाश होती है, जो लगता है कि सूखते जंगलों से गायब होते जा रहे हैं। और वे पानी के अन्य स्रोतों को भी खोजती हैं – क्योंकि अभयारण्य के तालाब सिकुड़ते जा रहे हैं। इसके अलावा, वन रक्षकों और ज़मीनी शोधकर्ताओं का कहना है कि ये जानवर अभयारण्य के भीतर समाप्त होते घास के मैदानों से भी परेशान हैं।

Anand Salvi lost an acre of jowar to a bison raid.
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Sunita Salvi says she blames the forest department.
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Metallic cots farmers sleep on in the fields, through the night.
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बाएं: आनंद सालवी ने बायसन के हमले के कारण अपने एक एकड़ खेत में लगी ज्वार खो दी। बीच में: सुनीता सालवी कहती हैं कि वह वन विभाग को दोषी मानती हैं। दाएं: किसान अपने खेतों की रखवाली के लिए रात में, खुले में धातु के इन खाटों पर सोते हैं। (तस्वीरें: संकेत जैन/PARI)

केंद्रीय भूमि जल बोर्ड के डेटा बताते हैं कि राधानगरी तालुका में 2004 में 3,510 मिमी, 2008 में 3,684 और 2012 में 3,072 मिमी बारिश हुई थी। लेकिन 2018 में यह महज़ 2,120 मिमी ही रही – जो कि एक भारी कमी है। दरअसल, पूरे कोल्हापुर जिले में एक दशक या उससे अधिक समय से बारिश लगातार अनियमित रही है – महाराष्ट्र के कई अन्य इलाकों का भी यही हाल है।

पचास वर्षीय चरवाहे, राजू पाटिल ने पहली बार, एक दशक पहले देवगढ़-निपाणी राज्य राजमार्ग पर 12 गौर का एक समूह देखा था। उन्होंने अपने गांव, राधानगरी के बाहरी इलाके में वन्यजीव अभयारण्य के बारे में सुना था। लेकिन उन्होंने गावा को कभी नहीं देखा था।

“केवल इस पिछले दशक में, मैंने उन्हें जंगल से बाहर आते देखा है,” वह कहते हैं। तब से, राधानगरी गांव के लोगों के लिए इन विशालकाय जानवरों को सड़क पार करते देखना एक आम बात हो गई है। ग्रामीणों ने इन जानवरों के वीडियो अपने सेलफोन पर बनाए हैं। गौर ने कोल्हापुर जिले के राधानगरी, शाहुवाडी, करवीर और पन्हाला तालुका में गन्ने, शालू (ज्वार), मकई और धान खाने के लिए खेतों में घुसना शुरू कर दिया है।

और पानी पीने के लिए – जो जंगल के भीतर उनके लिए दुर्लभ हो गया है।

राधानगरी तालुका में, ग्रामीणों का कहना है कि गावा ने पिछले 10-15 वर्षों के दौरान ही जंगल के बाहर हमला करना शुरू किया। पन्हाला तालुका में, यह हाल ही की घटना है। राक्षी गांव के 42 वर्षीय युवराज निरूखे, जिनके खेत जंगल के पास हैं, कहते हैं, “हमने गावा को पिछले दो वर्षों में ही देखा है। पहले जंगली सुअर हमारी फसलों पर हमला करते थे।” जनवरी के बाद से अब तक, 12 बायसन का एक समूह उनके 0.75 एकड़ खेत पर तीन बार धावा बोल चुका है। “मैंने कम से कम 4 क्विंटल शालू खो दिया और अब मुझे बारिश के इस मौसम में चावल की खेती करने से डर लग रहा है,” वह कहते हैं।

राधानगरी तालुका के लोगों ने अभयारण्य से निकलते और सड़क तथा राजमार्ग पार करते गौर के वीडियो अपने सेलफोन से बनाए हैं

“मौसम-चक्र पूरी तरह बदल गया है,” राधानगरी के वन परिक्षेत्र अधिकारी प्रशांत तेंदुलकर कहते हैं। “इससे पहले, मार्च और अप्रैल में कम से कम एक बार बारिश होती थी, जो तालाबों को भर देती थी। अगर हम प्रकृति के खिलाफ जा रहे हैं, तो किसे दोषी ठहराया जाना चाहिए? कोई 50-60 साल पहले जंगल की ज़मीन थी, फिर चरागाह, खेत और उसके बाद गांव थे। अब लोग इन ज़मीनों पर बसने लगे हैं और धीरे-धीरे जंगल की ओर बढ़ रहे हैं। जंगल और गांव के बीच की भूमि पर अतिक्रमण किया जा रहा है।”

इससे भी अधिक विनाशकारी प्रकृति का ‘अतिक्रमण’ हुआ है – जो कि बॉक्साइट का खनन है। कुछ दशकों से यह चालू और बंद होता रहा है।

“बॉक्साइट की खुली खदान से होने वाले खनन ने राधानगरी को पिछले कुछ वर्षों में तबाह कर दिया है,” सैंक्चुअरी एशिया के संस्थापक संपादक बिट्टू सहगल कहते हैं। “इसका बहुत विरोध हुआ था, लेकिन खनन कंपनियों जैसे कि इंडाल [जो बाद में हिंडालको में विलय हो गई] का सत्ता के गलियारों में प्रदर्शनकारियों से कहीं अधिक दबदबा था। ये कंपनियां सरकारी कार्यालयों में नीतियां बना रही थीं। खनन की गतिविधि से चरागाह, जल स्रोत, इन सभी को गंभीर क्षति पहुंची।”

दरअसल, 1998 से ही बॉम्बे हाई कोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट, दोनों ने ही इस तरह की गतिविधि पर एक से अधिक बार सख्त फटकार लगाई है। अक्टूबर 2018 के अंत में, उच्चतम न्यायालय ने इस मामले में राज्य द्वारा किसी भी प्रकार की चिंता न दिखाने के कारण महाराष्ट्र सरकार के मुख्य सचिव को अदालत में उपस्थिति रहने का आदेश दिया था।

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ऊपर की पंक्ति में बाएं: युवराज निरूखे इस मौसम में चावल की खेती करने से डर रहे हैं। दाएं: बायसन के कारण राजू पाटिल का गन्ने का 0.75 एकड़ खेत तबाह हो गया। नीचे की पंक्ति: मारुति निकम को पता चला कि बायसन के हमलों से नेपियर घास का आधा एकड़ (दाएं) नष्ट हो गया है। (तस्वीरें: संकेत जैन/PARI)

शिवाजी विश्वविद्यालय, कोल्हापुर के शोधकर्ताओं द्वारा 2012 के एक अध्ययन में खनन के निरंतर दीर्घकालिक प्रभावों के बारे में बताया गया। उनके शोध-पत्र, कोल्हापुर जिले के पर्यावरण पर बॉक्साइट खनन की गतिविधियों के प्रभाव पर अध्ययन, में कहा गया है कि “जायज़ तथा अवैध खनन की गतिविधि ने इस इलाके में गंभीर पर्यावरणीय तबाही की शुरुआत की है। हालांकि खनन ने शुरू में सीमित निवासियों को रोज़गार के अवसर प्रदान किए और सरकार के लिए राजस्व पैदा किया, लेकिन यह कुछ समय तक ही चलेगा। हालांकि, बदले हुए भूमि उपयोग के परिणामस्वरूप स्थानीय पारिस्थितिकी को होने वाली क्षति स्थायी है।”

राधानगरी से महज 24 किलोमीटर दूर एक और वन्यजीव अभयारण्य है – दाजीपुर। अलग होने से पहले, 1980 के दशक के मध्य तक दोनों एक ही इकाई थे। एक साथ, वे 351.16 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र को कवर करते हैं। दाजीपुर में लेटराइट पठार का एक हिस्सा, जिसे सावराई साडा भी कहा जाता है, जिसमें एक झील भी है, इस क्षेत्र के जानवरों तथा पक्षियों के लिए भोजन और पानी के प्रमुख स्रोतों में से एक है। लेकिन इस साल मई तक झील का अधिकांश हिस्सा सिकुड़ या सूख गया था।

इसके अलावा, “पिछले दशक में यहां अधिकांश वनों की कटाई हुई है। इसने [जलवायु] चक्रों को प्रभावित किया है,” अमित सैय्यद कहते हैं, जो एक वन्यजीव शोधकर्ता और वन्यजीव संरक्षण तथा अनुसंधान सोसायटी के अध्यक्ष हैं।

सावराई साडा उन स्थलों में से एक है जहां वन विभाग ने पशुओं के लिए कृत्रिम ‘सॉल्ट-लिक’ (वह स्थान जहां जानवर नमक या खनिज जैसे आवश्यक पोषक तत्वों को चाटने के लिए एकत्र होते हैं) बनाए हैं। दाजीपुर और राधानगरी, दोनों ही जगह कुछ स्थानों पर नमक तथा कोंडा (भूसी/चोकर) संग्रहीत किए गए हैं।

सॉल्ट-लिक्स की तुलना में मानव हस्तक्षेप का एक और कम सौम्य रूप है: गन्ने का फैलाव। कोल्हापुर जिला, जिसके कुछ तालुकों में अच्छी वर्षा होती है, दशकों से गन्ने की खेती का गढ़ था। हालांकि, इसमें वृद्धि थोड़ी चिंताजनक है। राज्य की चीनी कमिश्नरी तथा राजपत्रों के आंकड़ों से पता चलता है कि 1971-72 में कोल्हापुर में 40,000 हेक्टेयर भूमि पर गन्ने की खेती की गई थी। पिछले साल, 2018-19 में, यह क्षेत्र 155,000 हेक्टेयर था – यानी 287 प्रतिशत की वृद्धि। (महाराष्ट्र में गन्ने की खेती में प्रति एकड़ 18-20 मिलियन लीटर पानी लगता है)।

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ऊपर की पंक्ति में बाएं: अपने झुंड से बिछड़ा हुआ एक गौर। दाएं: लेटराइट पठार और कम होता जंगल। नीचे की पंक्ति में बाएं: सावराई साडा में जंगली जानवरों के लिए खनिज चाटने के रूप में रखा नमक और कोंडा (भूसी/चोकर)। दाएं: अभयारण्य के पास गन्ने का एक खेत। (तस्वीरें: संकेत जैन/PARI)

इन सभी प्रक्रियाओं का क्षेत्र की भूमि, जल, जंगल, वनस्पति और जीव, मौसम और जलवायु पर अपरिहार्य प्रभाव पड़ा है। इस अभयारण्य में वनों के प्रकार हैं दक्षिणी अर्द्ध-सदाबहार, दक्षिणी नम-मिश्रित पर्णपाती और दक्षिणी सदाबहार वन। इन सभी परिवर्तनों का प्रभाव इन अभयारण्यों के बाहर भी दिखता है, यहां के निवासियों पर भी इसके गंभीर परिणाम हुए हैं। मानव गतिविधि बढ़ रही है, लेकिन गौर का झुंड नहीं।

ऐसा माना जाता है कि कुछ दशक पहले इन शानदार जानवरों की संख्या 1,000 से अधिक थी, लेकिन महाराष्ट्र के वन विभाग के अनुसार, राधानगरी वन्यजीव अभयारण्य में अब केवल 500 बचे हैं। वन रेंज अधिकारी प्रशांत तेंदुलकर का व्यक्तिगत अनुमान 700 है। भारत में, गौर को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 की अनुसूची 1 के तहत वर्गीकृत किया गया है, जो सूचीबद्ध प्रजातियों को पूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है। इन जानवरों के खिलाफ अपराध उच्चतम दंड को आमंत्रित करते हैं। गौर अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ की खतरे वाली प्रजातियों की ‘लाल सूची’ में भी हैं, जो उन्हें ‘असुरक्षित’ के रूप में वर्गीकृत करती है।

गौर सफर पर हैं, लेकिन: “उनके [वन विभाग के] पास इन जानवरों के प्रवासन से संबंधित कोई आंकड़ा नहीं है,” अमित सैय्यद कहते हैं। “वे कहां जा रहे हैं? वे किस तरह के गलियारे का उपयोग कर रहे हैं? किस प्रकार के समूह हैं? एक समूह में कितने हैं? अगर वे समूहों की निगरानी कर रहे हैं, तो इस प्रकार की चीज़ें नहीं होंगी। इन गलियारों में जल निकायों की स्थापना की जानी चाहिए।”

भारतीय मौसम विभाग के आंकड़े बताते हैं कि कोल्हापुर जिले में जून 2014 में बारिश उस महीने के सामान्य औसत से 64 फीसदी कम थी। 2016 में 39 फीसदी से कम। 2018 में, यह औसत से एक प्रतिशत अधिक थी। जुलाई 2014 में, यह उस महीने के औसत से 5 प्रतिशत अधिक थी। उसके अगले साल जुलाई में यह 76 फीसदी कम थी। इस साल, 1 जून से 10 जुलाई की अवधि में वर्षा औसत से 21 प्रतिशत अधिक हुई। लेकिन, जैसा कि यहां के बहुत से लोग बताते हैं, इस साल अप्रैल और मई में मॉनसून से पहले की बारिश बिल्कुल नहीं हुई। “पिछले एक दशक से बारिश का पैटर्न अनियमित रहा है,” केरकर कहते हैं। इसकी वजह से इन वनों में अब कुछ ही बचे बारहमासी जल स्रोतों की समस्या और बढ़ गई है।

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ऊपर की पंक्ति में बाएं: दाजीपुर जंगल के भीतर (फोटो: संकेत जैन/PARI)। दाएं: अपने बछड़ों के साथ एक गौर भैंस। (फोटो: रोहन भाटे)। नीचे की पंक्ति में बाएं: बायसन के लिए प्राकृतिक तालाब के पास बनाया गया एक कृत्रिम तालाब। दाएं: सम्राट केरकर 3,000 लीटर के एक टैंकर से तालाब में पानी डाल रहे हैं। (तस्वीरें: संकेत जैन/PARI)

अप्रैल और मई 2017 में, राधानगरी और दाजीपुर के जंगलों में कुछ तालाब पहली बार कृत्रिम रूप से भरे गए – टैंकरों के पानी से। केरकर के बायसन नेचर क्लब द्वारा दोनों जंगलों में तीन स्थानों पर लगभग 20,000 लीटर पानी की आपूर्ति इसी तरह की गई। 2018 में, यह बढ़कर 24,000 लीटर हो गया। (जंगल में कई अन्य तालाब भी हैं जिनका रख-रखाव स्वयं वन विभाग द्वारा किया जाता है)।

हालांकि, “इस साल, वन विभाग ने हमें अज्ञात कारणों से राधानगरी रेंज के केवल एक तालाब में पानी की आपूर्ति करने की अनुमति दी,” केरकर कहते हैं। इस साल, एनजीओ ने 54,000 लीटर की आपूर्ति की। बहरहाल, “जून में मानसून की पहली दो वर्षा के बाद हम आपूर्ति बंद कर देते हैं,” केरकर बताते हैं।

वनों की कटाई, खनन, फसल के पैटर्न में बड़े बदलाव, अकाल, सामान्य सूखा, पानी की गुणवत्ता में गिरावट, भूजल का सूखना – इन सभी प्रक्रियाओं का राधानगरी और इसके आसपास के बड़े इलाके में वन, खेत, मिट्टी, मौसम और जलवायु पर प्रभाव पड़ा है।

लेकिन यह केवल प्राकृतिक जलवायु नहीं है जो बिगड़ रही है।

गौर-मानव टकराव की घटना बढ़ रही है। “गावा ने मेरे द्वारा 20 गुंठा [लगभग आधा एकड़] में लगाई गई सभी नेपियर घास खा ली,” पन्हाला तालुका के निकमवाडी गांव में छह एकड़ ज़मीन के मालिक, 40 वर्षीय मारुति निकम कहते हैं। “उन्होंने इस साल जनवरी से अप्रैल के बीच 30 गुंठा के एक और खेत पर मकई का सफाया कर दिया।

“बारिश के मौसम में, जंगल में ढेर सारा पानी होगा, लेकिन अगर उन्हें भोजन नहीं मिला, तो वे हमारे खेतों में लौट आएंगे।”

कवर फोटो: रोहन भाटे। हमें अपनी तस्वीरें उपयोग करने की अनुमति देने के लिए उनका, और सैंक्चुअरी एशिया का विशेष धन्यवाद।

जलवायु परिवर्तन पर PARI की राष्ट्रव्यापी रिपोर्टिंग, आम लोगों की आवाज़ों और जीवन के अनुभव के माध्यम से उस घटना को रिकॉर्ड करने के लिए UNDP-समर्थित पहल का एक हिस्सा है।

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हिंदी अनुवाद: मोहम्मद क़मर तबरेज़

मोहम्मद क़मर तबरेज़ 2015 से ‘पारी’ के उर्दू/हिंदी अनुवादक हैं। वह दिल्ली स्थित एक पत्रकार, दो पुस्तकों के लेखक, उर्दू समाचारपत्र ‘रोज़नामा मेरा वतन’ के न्यूज़ एडिटर हैं, और ‘राष्ट्रीय सहारा’, ‘चौथी दुनिया’ तथा ‘अवधनामा’ जैसे अख़बारों से जुड़े रहे हैं। उनके पास अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातक तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली से पीएचडी की डिग्री है। You can contact the translator here:

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संकेत जैन, महाराष्ट्र के कोल्हापुर में स्थित एक स्वतंत्र ग्रामीण पत्रकार और पारी वॉलंटियर हैं।

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