“शाम को 4 बजे हमें यहां गर्म रहने के लिए आग जलानी पड़ती थी,” केरल के पहाड़ी वायनाड जिले में अपने संघर्षरत खेत पर ऑगस्टाइन वडकिल कहते हैं। “लेकिन यह 30 साल पहले होता था। अब वायनाड में ठंड नहीं है, किसी ज़माने में यहां धुंध हुआ करती थी।” मार्च की शुरुआत में अधिकतम 25 डिग्री सेल्सियस से, अब यहां तापमान वर्ष के इस समय तक आसानी से 30 डिग्री को पार कर जाता है।

और वडकिल के जीवनकाल में गर्म दिनों की संख्या दोगुनी से अधिक हो गई है। 1960 में, जिस वर्ष उनका जन्म हुआ था, “वायनाड क्षेत्र प्रति वर्ष लगभग 29 दिन कम से कम 32 डिग्री [सेल्सियस] तक पहुंचने की उम्मीद कर सकता था,” जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग पर एक इंटरैक्टिव उपकरण से की गई गणना का कहना है, जिसे न्यूयॉर्क टाइम्स द्वारा इस साल जुलाई में ऑनलाइन पोस्ट किया गया था। “आज वायनाड क्षेत्र औसतन, प्रति दिन 32 डिग्री या उससे ऊपर 59 दिनों की उम्मीद कर सकता है।”

वडकिल कहते हैं कि मौसम के पैटर्न में बदलाव, गर्मी के प्रति संवेदनशील और कमजोर फसलों जैसे कि काली मिर्च और नारंगी के पेड़ों को नुकसान पहुंचा रहा है, जो कभी इस जिले में डेक्कन पठार के दक्षिणी सिरे पर पश्चिमी घाट में प्रचुर मात्रा में होते थे।

वडकिल और उनकी पत्नी वलसा के पास मनंथवाडी तालुका के चेरुकोट्टूर गांव में चार एकड़ खेत है। उनका परिवार लगभग 80 साल पहले कोट्टायम छोड़ वायनाड आ गया था, ताकि यहां इस नकदी फसल की प्रबुद्ध होती अर्थव्यवस्था में किस्मत आज़मा सके। वह भारी प्रवासन का दौर था जब राज्य के उत्तर-पूर्व में स्थित इस जिले में मध्य केरल के हजारों छोटे और सीमांत किसान आकर बस रहे थे।

लेकिन समय के साथ, लगता है कि यह तेज़ी मंदी में बदल गई। “अगर बारिश पिछले साल की तरह ही अनियमित रही, तो हम जिस [जैविक रोबस्टा] कॉफी को उगाते हैं, वह बर्बाद हो जाएगी,” वडकिल कहते हैं। “कॉफी लाभदायक है, लेकिन मौसम इसके विकास में सबसे बड़ी समस्या है। गर्मी और अनियमित वर्षा इसे बर्बाद कर देती है,” वलसा कहती हैं। इस सेक्टर में काम करने वाले लोग कहते हैं कि [रोबस्टा] कॉफी उगाने के लिए आदर्श तापमान 23-28 डिग्री सेल्सियस के बीच है।

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ऊपर की पंक्ति: वायनाड में कॉफी की फसल को फरवरी के अंत या मार्च की शुरुआत में अपनी पहली बारिश की आवश्यकता होती है और इसके एक सप्ताह बाद इसमें फूल आना शुरू हो जाता है। नीचे की पंक्ति: लंबे समय तक सूखा या बेमौसम की बारिश रोबस्टा कॉफी के बीजों (दाएं) का उत्पादन करने वाले फूलों (बाएं) को नष्ट कर सकती है

वायनाड की सभी कॉफी, जो मज़बूत-इन-बॉडी रोबस्टा परिवार की (एक उष्णकटिबंधीय सदाबहार झाड़ी) है, की खेती दिसंबर और मार्च के बीच की जाती है। कॉफी के पौधों को फरवरी के अंत या मार्च की शुरुआत में पहली बारिश की आवश्यकता होती है – और ये एक सप्ताह बाद फूल देना शुरू कर देते हैं। यह ज़रूरी है कि पहली बौछार के बाद एक सप्ताह तक बारिश न हो क्योंकि यह नाज़ुक फूलों को नष्ट कर देती है। कॉफी के फल या ‘चेरी’ को बढ़ना शुरू करने के लिए पहली बारिश के एक सप्ताह बाद दूसरी बारिश की ज़रूरत होती है। फूल जब पूरी तरह खिलने के बाद पेड़ से गिर जाते हैं, तो फलियों वाली चेरी पकने लगती है।

“समय पर बारिश आपको 85 प्रतिशत उपज की गारंटी देती है,” वडकिल कहते हैं। जब हम मार्च की शुरुआत में मिले थे, तो वह इस नतीजे की उम्मीद कर रहे थे, लेकिन चिंतित थे कि ऐसा होगा भी या नहीं। यह नहीं हुआ।

मार्च के आरंभ में, केरल की भीषण गर्मी की शुरुआत में, तापमान पहले ही 37 डिग्री ऊपर जा चुका था। “दूसरी बारिश (रंधामथ माझा) इस साल बहुत जल्द आ गई और सब कुछ नष्ट हो गया,” वडकिल ने हमें मार्च के अंत में बताया।

वडकिल, जो दो एकड़ में इस फसल को लगाते हैं, इसकी वजह से इस साल 70,000 रुपये का नुकसान हुआ। वायनाड सोशल सर्विस सोसायटी (WSSS) किसानों को एक किलो अपरिष्कृत जैविक कॉफी के 88 रुपये, जबकि अजैविक कॉफी के 65 रुपये देती है।

वायनाड में 2017-2018 में कॉफी के 55,525 टन के उत्पादन से, इस साल 40 प्रतिशत की गिरावट आई है, WSSS के निदेशक फादर जॉन चुरापुझायिल ने मुझे फोन पर बताया। WSSS एक सहकारी समिति है जो स्थानीय किसानों से कॉफी खरीदती है। अभी तक कोई आधिकारिक आंकड़ा सामने नहीं आया है। “उत्पादन में बहुत हद तक यह गिरावट इसलिए है क्योंकि जलवायु में बदलाव वायनाड में कॉफी के लिए सबसे बड़ा खतरा साबित हुए हैं,” फादर जॉन कहते हैं। पूरे जिले में जिन किसानों से हम मिले, वे अलग-अलग वर्षों में अतिरिक्त वर्षा और कभी-कभी कम वर्षा, दोनों से पैदावार में भिन्नता की बात कर रहे थे।

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ऑगस्टिन वडकिल और उनकी पत्नी वलसा (बाएं) कॉफी के साथ-साथ रबर, काली मिर्च, केले, धान और सुपारी भी उगाते हैं। बढ़ती हुई गर्मी ने हालांकि कॉफी (दाएं) और अन्य सभी फसलों को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया है

कम-ज़्यादा बारिश से खेतों का पानी सूख जाता है। फ़ॉदर जॉन का अनुमान है कि “वायनाड के केवल 10 प्रतिशत किसान ही बोरवेल और पम्प जैसी सिंचाई सुविधाओं के साथ सूखे या अनियमित वर्षा के दौरान काम कर सकते हैं।”

वडकिल भाग्यशाली लोगों में से नहीं हैं। अगस्त 2018 में वायनाड और केरल के अन्य हिस्सों में आई बाढ़ के दौरान उनका सिंचाई पम्प क्षतिग्रस्त हो गया था। इसकी मरम्मत कराने पर उन्हें 15,000 रुपये खर्च करने पड़ते, जो कि ऐसे समय में बहुत बड़ी राशि है।

अपनी शेष दो एकड़ जमीन पर वडकिल और वलसा रबर, काली मिर्च, केले, धान और सुपारी उगाते हैं। हालांकि बढ़ती गर्मी ने इन सभी फसलों को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया है। “पंद्रह साल पहले, काली मिर्च ही हम सभी को जीवित रखने का स्रोत थी। लेकिन [तब से] ध्रुथवात्तम [तेज़ी से कुम्हलाने] जैसी बीमारियों ने जिले भर में इसे नष्ट कर दिया है।” चूंकि काली मिर्च एक बारहमासी फसल है, इसलिए किसानों का नुकसान विनाशकारी रहा है।

“समय बीतने के साथ, ऐसा लगता है कि खेती करने का एकमात्र कारण यह है कि आपको इसका शौक हो। मेरे पास यह सारी ज़मीन है, लेकिन मेरी स्थिति देखें,” वडकिल कहते हैं। “इन मुश्किल घड़ियों में आप केवल इतना कर सकते हैं कि कुछ अतिरिक्त मिर्च को पीसें क्योंकि आप चावल के साथ इसे खा सकते हैं,” वह हंसते हुए कहते हैं।

“यह 15 साल पहले शुरू हुआ,” वह कहते हैं। “कालावस्था इस तरह क्यों बदल रही है?” दिलचस्प बात यह है कि मलयालम शब्द कालावस्था का अर्थ जलवायु है, तापमान या मौसम नहीं। यह सवाल हमसे वायनाड के किसानों ने कई बार पूछा था।

बदकिस्मती से, इसके जवाब का एक हिस्सा किसानों द्वारा दशकों से अपनाए गए खेती के तौर-तरीकों में निहित है।

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अन्य बड़ी भूसंपत्ति की तरह, मानंथवाडी में स्थित यह कॉफ़ी एस्टेट (बाएं) बारिश कम होने पर कृत्रिम तालाब खोदने और पम्प लगाने का खर्च उठा सकता है। लेकिन वडकिल जैसे छोटे खेतों (दाएं) को पूरी तरह से बारिश या अपर्याप्त कुओं पर निर्भर रहना पड़ता है

“हम कहते हैं कि हर एक भूखंड पर कई फसलों को उगाना अच्छा है बजाय इसके कि एक ही फसल लगाई जाए, जैसा कि आजकल हो रहा है,” सुमा टीआर कहती हैं। वह एमएस स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन, वायनाड में एक वैज्ञानिक हैं, जो भूमि-उपयोग-परिवर्तन के मुद्दों पर 10 वर्षों तक काम कर चुकी हैं। एक-फसली खेती कीटों और बीमारियों के प्रसार को बढ़ाती है, जिसका इलाज रासायनिक कीटनाशकों और उर्वरकों से किया जाता है। ये भूजल में चले जाते हैं या हवा में घुल जाते हैं, जिससे मैलापन और प्रदूषण होता है - और समय के साथ गंभीर पर्यावरणीय क्षति होती है।

सुमा कहती हैं कि यह अंग्रेजों द्वारा वनों की कटाई से शुरू हुआ। “उन्होंने लकड़ी के लिए जंगलों को साफ किया और कई ऊंचाई वाले पहाड़ों को वृक्षारोपण में बदल दिया।” वह आगे कहती हैं कि जलवायु में परिवर्तन भी इससे जुड़ा हुआ है कि “कैसे [1940 के दशक से शुरू होने वाले जिले में बड़े पैमाने पर प्रवासन के साथ] हमारा परिदृश्य भी बदल गया। इससे पहले, वायनाड के किसान मुख्य रूप से अलग-अलग फसलों की खेती किया करते थे।”

उन दशकों में, यहां की प्रमुख फसल धान थी, कॉफ़ी या काली मिर्च नहीं - खुद ‘वायनाड’ शब्द भी ‘वायल नाडु’ या धान के खेतों की भूमि से आता है। वे खेत इस क्षेत्र - और केरल के पर्यावरण तथा पारिस्थितिक तंत्र के लिए महत्वपूर्ण थे। लेकिन धान का रकबा - 1960 में लगभग 40,000 हेक्टेयर - आज बमुश्किल 8,000 हेक्टेयर रह गया है। जो कि 2017-18 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जिले के सकल फसली क्षेत्र के 5 प्रतिशत से भी कम हैं। और अब वायनाड में कॉफी बागान लगभग 68,000 हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करते हैं। जो कि केरल में कुल कॉफी क्षेत्र का 79 प्रतिशत हैं - और 1960 में देश भर में सभी रोबस्टा से 36 प्रतिशत अधिक था, वडकिल का जन्म उसी साल हुआ था।

“किसान नकदी फसलों के लिए ज़मीन साफ़ करने के बजाय पहाड़ी पर रागी जैसी फ़सलों की खेती कर रहे थे,” सुमा कहती हैं। खेत पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने में सक्षम थे। लेकिन, वह कहती हैं, बढ़ते पलायन के साथ नकदी फसलों ने खाद्य फसलों पर बढ़त बना ली। और 1990 के दशक में वैश्वीकरण के आगमन के साथ, ज़्यादा से ज़्यादा लोगों ने काली मिर्च जैसे नकदी फसलों पर पूरी तरह से निर्भर होना शुरू कर दिया।

‘उत्पादन में गिरावट इसलिए आई है क्योंकि जलवायु परिवर्तन वायनाड में कॉफी के लिए सबसे बड़ा खतरा साबित हुआ है’ – पूरे जिले में हम जितने भी किसानों से मिले, उन सभी ने इस गंभीर परिवर्तन की बात कही

वीडियो देखें: खेती करना केवल तभी समझदारी है जब यह एक शौक हो

“आज, किसान एक किलोग्राम धान से 12 रुपये और कॉफी से 67 रुपये कमा रहे हैं। हालांकि, काली मिर्च से उन्हें प्रति किलो 360 रुपये से 365 रुपये मिलता है,” WSSS के एक पूर्व परियोजना अधिकारी, और मनंथवाडी शहर के एक जैविक किसान, ईजे जोस कहते हैं। मूल्य में इतने बड़े अंतर ने कई और किसानों को धान की खेती छोड़ काली मिर्च या कॉफी का विकल्प चुनने पर मजबूर किया। “अब हर कोई वही उगा रहा है जो सबसे ज़्यादा लाभदायक हो, ना कि जिसकी ज़रूरत है। हम धान भी खो रहे हैं, जो कि एक ऐसी फसल है जो बारिश होने पर पानी को अवशोषित करने में मदद करती है, और पानी की तालिकाओं को पुनर्स्थापित करती है।”

राज्य में धान के कई खेतों को भी प्रमुख रियल एस्टेट भूखंडों में बदल दिया गया है, जो इस फसल की खेती में कुशल किसानों के कार्यदिवस को कम कर रहा है।

“इन सभी परिवर्तनों का वायनाड के परिदृश्य पर निरंतर प्रभाव पड़ रहा है,” सुमा कहती हैं। “एक फसली खेती के माध्यम से मिट्टी को बर्बाद किया गया है। बढ़ती हुई जनसंख्या [1931 की जनगणना के समय जहां 100,000 से कम थी वहीं 2011 की जनगणना के समय 817,420 तक पहुंच गई] और भूमि विखंडन इसके साथ आता है, इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि वायनाड का मौसम गर्म होता जा रहा है।”

जोस भी यह मानते ​​हैं कि कृषि के इन बदलते तरीकों का तापमान की वृद्धि से करीबी रिश्ता है। “कृषि के तरीकों में बदलाव ने वर्षा में परिवर्तन को प्रभावित किया है,” वह कहते हैं।

पास की थविनहल पंचायत में, अपने 12 एकड़ के खेत में हमारे साथ घूमते हुए, 70 वर्षीय एमजे जॉर्ज कहते हैं, “ये खेत किसी ज़माने में काली मिर्च से इतने भरे होते थे कि सूरज की किरणों का पेड़ों से हो कर गुजरना मुश्किल होता था। पिछले कुछ वर्षों में हमने कई टन काली मिर्च खो दी है। जलवायु की बदलती परिस्थितियों के कारण पौधों के तेज़ी से मुर्झाने जैसी बीमारियां हो रही हैं।”

कवक फाइटोफ्थोरा के कारण, तेज़ी से मुर्झाने की बीमारी ने जिले भर के हजारों लोगों की आजीविका को समाप्त कर दिया है। यह उच्च आर्द्रता की स्थितियों में पनपता है “इसमें पिछले 10 वर्षों में वायनाड में काफी वृद्धि हुई है”, जोस कहते हैं। “बारिश अब अनियमित होती है। रासायनिक उर्वरकों के बढ़ते उपयोग ने भी इस रोग को फैलने में मदद की है, जिससे ट्राइकोडर्मा नामक अच्छे बैक्टीरिया धीरे-धीरे मरने लगते हैं, हालांकि यह बैक्टीरिया कवक से लड़ने में मदद करता था।”

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ऊपर बाएं: एमजे जॉर्ज कहते हैं, ‘हम अपनी वर्षा के लिए प्रसिद्ध थे’। ऊपर दाएं: ‘इस साल हमें कॉफी की सबसे कम पैदावार मिली’, सुभद्रा बालकृष्णन कहती हैं। नीचे बाएं: एक वैज्ञानिक, सुमा टीआर कहती हैं कि यह अंग्रेजों द्वारा वनों की कटाई से शुरू हुआ। नीचे दाएं: ‘आजकल हर कोई वही उगा रहा है जो सबसे ज़्यादा लाभदायक हो, ना कि वह जिसकी जरूरत है’, ईजे जोस कहते हैं

“पहले हमारे पास वायनाड में वातानुकूलित जलवायु थी, लेकिन अब नहीं है,” जॉर्ज कहते हैं। “बारिश, जो पहले वर्षा ऋतु में लगातार होती थी, अब पिछले 15 वर्षों के दौरान इसमें काफी कमी आई है। हम अपनी वर्षा के लिए प्रसिद्ध थे…”

भारत मौसम विज्ञान विभाग, तिरुवनंतपुरम का कहना है कि 1 जून से 28 जुलाई, 2019 के बीच वायनाड में बारिश सामान्य औसत से 54 प्रतिशत कम थी।

आम तौर पर उच्च वर्षा का क्षेत्र होने की वजह से, वायनाड के कुछ हिस्सों में कई बार 4,000 मिमी से अधिक बारिश होती है। लेकिन कुछ वर्षों से जिला के औसत में बेतहाशा उतार-चढ़ाव हुआ है। यह 2014 में 3,260 मिमी था, लेकिन उसके बाद अगले दो वर्षों में भारी गिरावट के साथ यह 2,283 मिमी और 1,328 मिमी पर पहुंच गया। फिर, 2017 में यह 2,125 मिमी था और 2018 में, जब केरल में बाढ़ आई थी, यह 3,832 मिमी की ऊंचाई पर पहुंच गया।

“हाल के दशकों में वर्षा की अंतर-वार्षिक परिवर्तनशीलता में बदलाव हुआ है, विशिष्ट रूप से 1980 के दशक से, और 90 के दशक में इसमें तेज़ी आई”, डॉ. गोपाकुमार चोलायिल कहते हैं, जो केरल कृषि विश्वविद्यालय, त्रिशूर की जलवायु परिवर्तन शिक्षा और अनुसंधान अकादमी में वैज्ञानिक अधिकारी हैं। “और मानसून तथा मानसून के बाद की अवधि में पूरे केरल में अत्यधिक वर्षा की घटनाएं बढ़ी हैं। वायनाड इस मामले में कोई अपवाद नहीं है।”

यह, वास्तव में, वडकिल, जॉर्ज तथा अन्य किसानों के अवलोकन की पुष्टि करता है। वे भले ही ‘कमी’ का शोक मना रहे हैं - और दीर्घकालिक औसत गिरावट का संकेत दे रहे हैं – लेकिन उनके कहने का मतलब यही है कि जिन मौसमों और दिनों में उन्हें बारिश की ज़रूरत और उम्मीद होती है उनमें वर्षा बहुत कम होती है। यह ज़्यादा वर्षा के साथ-साथ कम बारिश के वर्षों में भी हो सकता है। जितने दिनों तक बारिश का मौसम रहता था अब उन दिनों में भी कमी आ गई है, जबकि इसकी तीव्रता बढ़ गई है। वायनाड में अभी भी अगस्त-सितंबर में बारिश हो सकती है, हालांकि यहां मानसून का मुख्य महीना जुलाई है। (और 29 जुलाई को, मौसम विभाग ने इस जिले के साथ-साथ कई अन्य जिलों में ‘भारी’ से ‘बहुत भारी’ बारिश का ‘ऑरेंज अलर्ट’ जारी किया था।”

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वायनाड में वडकिल के नारियल तथा केले के बागान अनिश्चित मौसम के कारण धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं

“फसल के तौर-तरीकों में बदलाव, जंगल की कटाई, भूमि उपयोग के रूप...इन सबका पारिस्थितिक तंत्र पर गंभीर असर पड़ा है,” डॉ. चोलायिल कहते हैं।

“पिछले साल की बाढ़ में मेरी कॉफी की सभी फसल नष्ट हो गई थी,” सुभद्रा कहती हैं जिन्हें मनंथवाडी में लोग प्यार से ‘टीचर’ कहके पुकारते हैं। 75 वर्षीय किसान (सुभद्रा बालकृष्णन) कहती हैं, “इस साल वायनाड में कॉफी का उत्पादन सबसे कम हुआ।” वह एडवाक पंचायत में अपने परिवार की 24 एकड़ ज़मीन पर खेती की निगरानी करती हैं और अन्य फसलों के अलावा, कॉफी, धान और नारियल उगाती हैं। “वायनाड में [कॉफी के] कई किसान [आय के लिए] अब तेजी से अपने मवेशियों पर निर्भर होते जा रहे हैं।”

हो सकता है कि वे ‘जलवायु परिवर्तन’ शब्द का उपयोग ना करें, लेकिन हम जितने भी किसानों से मिले वे सभी इसके प्रभावों से चिंतित हैं।

अपने अंतिम पड़ाव पर - सुल्तान बाथेरी तालुका की पूठाडी पंचायत में 80 एकड़ में फैली एडेन घाटी में – हम पिछले 40 वर्षों से एक खेतिहर मज़दूर, गिरीजन गोपी से मिले जब वह अपनी आधी पारी खत्म करने वाले थे। “रात में बहुत ठंड होती है और दिन में बहुत गर्मी। कौन जानता है कि यहां क्या हो रहा है,” अपने दोपहर के भोजन के लिए जाने से पहले उन्होंने कहा, और बड़बड़ाते हुए खुद से कहा: “देवताओं को होना चाहिए। वर्ना हम यह सब कैसे समझ पाएंगे?”

कवर फोटो: विशाका जॉर्ज

लेखिका इस स्टोरी को करते समय अपना समय और उदार सहायता प्रदान करने के लिए शोधकर्ता, नोएल बेनो को धन्यवाद देना चाहती हैं।

जलवायु परिवर्तन पर PARI की राष्ट्रव्यापी रिपोर्टिंग, आम लोगों की आवाज़ों और जीवन के अनुभव के माध्यम से उस घटना को रिकॉर्ड करने के लिए UNDP-समर्थित पहल का एक हिस्सा है।

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हिंदी अनुवाद: मोहम्मद क़मर तबरेज़

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मोहम्मद क़मर तबरेज़ 2015 से ‘पारी’ के उर्दू/हिंदी अनुवादक हैं। वह दिल्ली स्थित एक पत्रकार, दो पुस्तकों के लेखक, उर्दू समाचारपत्र ‘रोज़नामा मेरा वतन’ के न्यूज़ एडिटर हैं, और ‘राष्ट्रीय सहारा’, ‘चौथी दुनिया’ तथा ‘अवधनामा’ जैसे अख़बारों से जुड़े रहे हैं। उनके पास अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातक तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली से पीएचडी की डिग्री है। You can contact the translator here:

Vishaka George

विशाका जॉर्ज बेंगलुरू स्थित पत्रकार हैं जो रॉयटर के लिए व्यापार-संवाददाता के रूप में काम कर चुकी हैं। एशियन कॉलेज ऑफ जर्नलिज्म से स्नातक करने वाली विशाका, महिलाओं तथा बच्चों पर विशेष ध्यान देते हुए ग्रामीण भारत को कवर करना चाहती हैं।

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