रामीण भारत की महिलाएं अपने जागृत जीवन का एक तिहाई हिस्सा पानी लाने, ईंधन और चारा इकट्ठा करने में खर्च कर सकती हैं


वह एक दूसरे के ऊपर अव्यवस्थित ढंग से रखे हुए पत्थर के तीन और लकड़ी के एक टुकड़े के ऊपर दिलरुबा अंदाज में सीधे खड़ी थी। पत्थरों का आकार और स्वरूप अलग-अलग था। लकड़ी के टुकड़े ने उसे समतल जगह प्रदान की। उसका संबंध महाराष्ट्र के यवतमाल जिला के एक ग्रामीण परिवार से था, और वह कोशिश कर रही थी कि टैंक के पाइप से जो पानी बह रहा है उसमें से जितना वह इकट्ठा कर सकती थी, उतना पानी जमा कर ले। गजब के धैर्य और संतुलन के साथ वह अपने सिर के ऊपर एक बर्तन रखती, उसे भर्ती, फिर उस पानी को जमीन पर रखे बड़े बर्तन में डाल देती। जब दोनों बर्तन पानी से भर जाते, तो वह अपने घर की ओर चल पड़ती, इस पानी को वहाँ इकट्ठा करती है, तथा और अधिक पानी भरने के लिए लौट आती। हर बार वह 15-20 लीटर पानी और धातु के दो बर्तन लगभग आधा किलोमीटर लेकर जाती।

इसी राज्य के अमरावती जिला में शारदा बदरे और उनकी बेटियां अपने घर के समीप स्थित अपने अनार के वृक्षों को पानी देने के लिए वर्षों संघर्ष कर चुकी हैं। उनके पानी का स्रोत केवल 300 मीटर दूर है। ग्रामीण मानकों के अनुसार, अगले दरवाजे। ''लेकिन वृक्षों को 214 बड़े बर्तन का पानी चाहिए,'' वे बताती हैं। आना और जाना, दोनों मिलाकर 428 चक्कर, उनमें से आधे उनके सिर पर पानी से भरे बर्तन के साथ। या समग्र रूप से इन छोटे चक्करों को मिलाकर, इन तीनों महिलाओं में से प्रत्येक के लिए 40 किमी से अधिक दूरी। वे ''आधे वृक्षों को हर सोमवार को पानी देती हैं और बाकी आधे को हर गुरुवार को।'' इसके अलावा बाकी दिनों में खेतों में अलग से काम करना, अधिकतर अप्रैल-मई के महीने में 45 डिग्री सेल्सियस (113 डिग्री फॉरेन हाइट) तापमान में।

लेकिन यह बात अब पुरानी हो चुकी है। अब जब कि पानी के पुराने स्रोत सूख रहे हैं और जितना पानी मौजूद है उसका अधिकांश भाग उद्योगों और शहरों को सप्लाई किया जा रहा है, जिसकी वजह से ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की समस्या बढ़ती जा रही है, भारत के गांवों में रहने वाली लाखों अन्य महिलाओं की तरह बदरे और उनकी बेटियों को पहले की अपेक्षा अधिक दूरी तय करनी पड़ती हैं। गरीब ग्रामीण महिलाएं ये काम हर समय करती हैं, और दुनिया के हर हिस्से में करती हैं।



ग्रामीण भारत की कई महिलाएं अपने जागृत जीवन का एक तिहाई भाग तीन कार्यों में खर्च कर सकती हैं: पानी लाना, ईंधन इकट्ठा करना और चारा जमा करना। लेकिन, वे इसके अतिरिक्त भी बहुत कुछ करती हैं। और लाखों ग्रामीण परिवारों की अर्थव्यवस्था अधिकांशतर उन्हीं के परिश्रम पर निर्भर है।

केरल के दूरदराज क्षेत्र, ऐडमालाकुडी की 60 महिलाएं कुछ महीने पहले ही अपने गांव को बिजली से चमकाने के लिए सौ से अधिक सौर पैनल लाने के लिए एकत्रित हुईं। इसका मतलब था, इन पैनलों को मुन्नार टाउन के पास पेट्टीमुडी में अपने सिर पर लादना और फिर उन्हें पहाड़ियों, जंगलों और जंगली हाथियों के क्षेत्र वाले 18 किलोमीटर के रास्ते से अपने गांव ले आना। ये महिलाएं ही थीं, अधिकांश अशिक्षित, सब की सब आदिवासी, जिन्होंने अपने गांव की निर्वाचित परिषद को समझाया कि सौर ऊर्जा ही समय की आवश्यक्ता है

उनमें से प्रत्येक पैनल का वजन 9 किलो तक हो सकता है और अधिकांश महिलाएं अपने सिर पर दो पैनल लादकर ले आईं। उनमें से कुछ आदिवासी महिलाएं पतली थीं, जिनका वजन 40 किलो के आसपास था, यानी दो पैनल का मतलब हुआ उनके शरीर के वजन का लगभग आधा।

पिछले दो दशकों के दौरान इन महिलाओं को ग्रामीण भारत के बुनियादी और अक्सर बेरहम बदलाव का भी शिकार होना पड़ा है। क्योंकि लाखों को गांवों से पलायन करना पड़ा है या फिर खेती छोड़नी पड़ी है, इसलिए उनके काम का बोझ भी बढ़ा है (महिला और पुरुष दोनों ही पलायन कर रहे हैं, लेकिन इसमें पुरुषों की संख्या अधिक है)। महिलाओं को न केवल दुग्ध-व्यवसाय और मुर्गियों की देखभाल की पारंपरिक भूमिका को निभाने के लिए मजबूर किया जाता है, बल्कि वे खेती का भी बहुत सारा काम करती हैं। अब इतने बड़े नए दबाव के कारण उन्हें पशुओं की देखभाल के लिए कम समय मिल पाता है।

कृषि में भी 1990 के दशक तक, खेतों में बीज डालने वालों में 76 प्रतिशत संख्या महिलाओं की थी, जबकि धान के पौधों को एक जगह से उखाड़कर दूसरी जगह लगाने वालों में 90 प्रतिशत महिलाएं शामिल थीं। खेतों से घरों तक फसल काटकर ले जाने में महिलाओं की हिस्सेदारी 82 प्रतिशत थी, खेत जोत कर फसल के लिए तैयार करने के काम में 32 प्रतिशत और दूध के कारोबार में 69 प्रतिशत महिलाएं शामिल थीं। अब उनके काम का बोझ इससे भी कहीं अधिक हो चुका है।



जैसा कि जॉर्ज मोनबियोट का कहना है: ''अगर धन कड़ी मेहनत और उद्यम का अंतिम परिणाम होता तो अफ्रीका की हर महिला करोड़पति होती।''

यह बात हर जगह की ग्रामीण गरीब महिलाओं पर लागू होती है।

मील के पत्थर या चक्की के पाट?

संयुक्त राष्ट्र ने 15 अक्टूबर को ग्रामीण महिलाओं का अंतर्राष्ट्रीय दिवस घोषित किया है। और 17 अक्टूबर को गरीबी उन्मूलन का अंतर्राष्ट्रीय दिवस। उसने वर्ष 2014 को भी पारिवारिक खेती का अंतरराष्ट्रीय साल कहा। भारत में लाखों ग्रामीण महिलाएं इन 'पारिवारिक खेतों' पर मजदूरी करती हैं। लेकिन जब स्वामित्व का सवाल आता है, तो ऐसा लगता है कि वे 'परिवार' का हिस्सा नहीं हैं। खेत के मालिक के रूप में उनका नाम शायद ही लिखा जाता है। और ग्रामीण महिलाओं की बड़ी संख्याओं की गिनती गरीबों में सबसे गरीब के रूप में होती है।

ये सभी 'मील के पत्थर' मीडिया के लिए कम महत्व रखते हैं। उनके लिए तो मतलब की बात तब आई, जब फोर्ब्स एशिया ने 20 अक्टूबर को अपना अंक प्रकाशित किया। वह भी तब, जब फोर्ब्स एशिया ने भारत के 100 सबसे अमीर लोगों की अपनी सूची प्रकाशित की, जिसमें उसने ऐलान किया कि ये सभी अब डॉलर में करोड़पति हैं। ग्रामीण महिलाओं पर कोई कवर स्टोरी नहीं प्रकाशित होगी।

जबरन विस्थापन से सबसे अधिक महिलाएं ही प्रभावित हुई हैं। ग्रामीण भारत में 1990 के दशक से ही यह आम बात है, जिसने लाखों लोगों की ज़िंदगी को उजाड़ दिया है। राज्य ने निजी और सरकारी औद्योगिक परियोजनाओं और 'स्पेशल इकनॉमिक जोन' के लिए जबरन खेतों पर कब्जा कर लिया है। जब ऐसा होता है, तब महिलाओं द्वारा पानी, ईंधन और चारे की तलाश में तय की गई दूरी बढ़ जाती है। और ऐसा करते समय उन्हें नई जगहों पर मौजूद स्थानीय लोगों की दुश्मनी भी मोल लेनी पड़ती है। आज वनों तक में उनकी पहुँच सीमित हो गई है, जो कभी वहाँ से वन-उत्पाद प्राप्त करते थे। और विस्थापन पर मजबूर हुए लोगों के लिए सम्मान के साथ काम बहुत कम, बल्कि नहीं के बराबर अवसर हैं।

यहां तक ​​कि सबसे सफल किसानों को भी विस्थापन का डर लगा रहता है, जैसा कि पूर्वी राज्य ओडिशा की गुज्जरी मोहंती आपको बताएंगी। गुज्जरी की आयु 70 वर्ष है और वह पान के पत्तों की खेती करने वाली एक कुशल किसान हैं। लेकिन उनका गांव इस्पात की बड़ी कंपनी पोस्को के खिलाफ विद्रोह पर आमादा है, जिसे राज्य सरकार ने उनके जैसे कई लोगों के खेतों को देने का वादा कर रखा है।

''वे क्या नौकरी देंगे?'' वह सवाल करती हैं। ''यह फैक्ट्रियां मशीनों से चलती हैं, मनुष्यों से नहीं। कंप्यूटर और मोबाइल फोन ने अधिक नौकरियां पैदा की हैं या कम? पान के पत्तों से लदे मेरे खेत को देखिए कि इससे कितने लोगों का जीवनयापन चल रहा है।''




ग्रामीण महिलाओं को दूसरी वजहों से भी बढ़ा धक्का लगा है। नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो के डेटा के अनुसार, 1995 से [DS2] अब तक लगभग 300,000 किसानों ने आत्महत्या की है। (http://psainath.org/maharashtra-crosses-60000-farm-suicides/) आधिकारिक गिनती के हिसाब से, ऐसा करने वालों में सबसे अधिक संख्या पुरुषों की है। इसके कारण महिलाओं पर अविश्वसनीय दबाव पड़ता है, क्योंकि उन्हें अचानक बड़े परिवारों को चलाने, बैंकों, साहूकारों और नौकरशाही से निपटने के लिए छोड़ दिया जाता है।

यह भी एक तथ्य है कि आम तौर पर महिला किसानों की आत्महत्याओं की गणना कम की जाती है, क्योंकि महिलाओं को अक्सर किसान ही नहीं माना जाता। उन्हें केवल किसानों की पत्नियां कहा जाता है। यह एक तरह से खेतों पर उनके मालिकाना अधिकार न होने की वजह से है। (जो किसान नहीं हैं उनमें भी, ग्रामीण भारत की युवा महिलाओं की अधिकतर मृत्यु आत्महत्या की वजह से होती है)।


पीड़ा और विडंबना

यहां पर विडंबना केवल यही नहीं है कि पूरी दुनिया की इन महिलाओं की पीड़ा साल दर साल बढ़ती जा रही है। बल्कि असल विडंबना यह है कि उनके अंदर हमारे समय की बड़ी से बड़ी समस्याओं के समाधान में मदद करने का माद्दा और सोच है। इनमें शामिल हैं: खाद्य सुरक्षा, पर्यावरणीय न्याय, सामाजिक और साझा अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना, आदि।

हालांकि, इनमें से किसी एक को भी करने के लिए, हमें गहरे और मौलिक परिवर्तन की जरूरत पड़ेगी। न कि छोटे-छोटे कार्यक्रमों की।

हमसे अधिक से अधिक महिलाएं कहती हैं कि वे असुरक्षित कृषि मजदूरों की नौकरी छोड़कर स्वतंत्र उत्पादक बनना पसंद करेंगी। स्वतंत्र उत्पादक के रूप में अपनी मजदूरी और समय पर उनका नियंत्रण होगा, और इस पर भी कि वे कैसे और क्या उत्पादन करें। अगर महिलाओं के इस सपने को पूरा करना है, तो इसके लिए दो चीजों की जरूरत पड़ेगी।

पहली, संसाधनों के अधिकार की एक मजबूत प्रणाली, विशेषकर भूमि-अधिकार। जैसा कि संयुक्त राष्ट्र खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ)  का अनुमान है, विकासशील क्षेत्रों की महिलाओं को जमीन पर मालिकाना या उसे चलाने का अधिकार कम है या फिर किराए की जमीन तक पर उनकी पहुंच कम है। अगर उनके पास कोई जमीन है भी, तो उन खेतों की गुणवत्ता खराब होती है या फिर आकार में वह खेत छोटा होता है। पशुओं और अन्य संपत्तियों तक महिलाओं की पहुंच का पैटर्न वैश्विक स्तर पर भी देखा जा सकता है।

दूसरी चीज है संरचनात्मक ढांचों का निर्माण जो महिलाओं को अपने सबसे बड़े स्रोत के दोहन का अवसर दे। वह हैः उनकी भागीदारी वृत्ति, उनकी एकता।

इसके लिए कुछ बड़ी सोच की जरूरत है। व्यक्ति पर आधारित माइक्रो-क्रेडिट मॉडल्स ने लंबे समय तक दुनिया पर राज किया है। और उसने महिलाओं का जीवन कैसे नष्ट किया है, इसके पर्याप्त सबूत दुनिया के विभिन्न भागों से मिल रहे हैं। भारत में, सबसे बड़ा उदाहरण आंध्र प्रदेश से आया। माइक्रो-क्रेडिट के कारण होने वाली आत्महत्याओं ने कुछ माइक्रो-लेंडिंग-आपरेशनों की ऑर्डिनेंस आर्डरिंग को बंद करवा दिया। (अध्ययनों की बढ़ती संख्या सब-सहारन अफ्रीका तथा लातीनी अमेरिका में माइक्रो-क्रेडिट समस्याओं की ओर इशारा करती हैं, और आम तौर पर वॉल स्ट्रीट का पाई का एक टुकड़ा मांगना)।

स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) लोकप्रिय विकल्प के रूप में उभरते हैं और वे माइक्रो-क्रेडिट का एक महत्वपूर्ण विकल्प ज़रूर प्रस्तुत करते हैं। हालांकि, एसएचजी भी अक्सर ऐसे 'एकमात्र' संगठन साबित हुए हैं जो उचित रूप से इन सभी क्षेत्रों को जोड़ नहीं पाते जहां लिंगभेद किया जा रहा है। उदाहरण के रूप में घर में, समुदाय में, कार्यस्थल पर और राजनीतिक क्षेत्र में।

लेकिन जब ऐसे संपर्क बनाए जाएंगे, तो बड़ी चीजों को अंजाम दिया जा सकता है।

एकता नए स्थान प्रदान करता है

केरल की कुडुम्बाश्री को ही ले लीजिए। 40 लाख महिलाओं का नेटवर्क, जिनमें से अधिकांश का संबंध गरीबी रेखा से नीचे है।




केरल सरकार द्वारा 1998 में शुरू की गई इस पहल का उद्देश्य पिछड़ी महिलाओं की समग्र क्षमता को प्रोत्साहित करना और सुविधाजनक बनाना था, ताकि उनकी गरीबी के बुनियादी कारणों को दूर किया जा सके। यह केरल के प्रसिद्ध 'पीपुल्स प्लान' प्रोसेस के दौरान शुरू किया गया, इसका उद्देश्य राज्य और उसके नागरिकों के बीच की बाधाओं को दूर करना था। इसने निचले स्तर पर मौजूद सामुदायिक प्रयासों से तैयार की गई परियोजनाओं को खोजना आरंभ किया। तदनुसार, कुडुम्बाश्री के पास शुरू से ही एक समुदाय और नौकरशाही वाला ढांचा मौजूद था जो आपस में मिलकर काम करता है। इसके शासी निकाय की अध्यक्षता लोकल सेल्फ गवर्नमेंट के राज्य मंत्री ने की। हर जिले में कुडुम्बाश्री का एक कार्यालय होता है जिसमें एक क्षेत्राधिकारी तैनात किया जाता है। इस सरकारी संरचना का मुख्य कार्य पूरे राज्य में फैले इस सामुदायिक नेटवर्क की गतिविधियों की सहायता करना है, जिसमें अब महिलाओं की संख्या बढ़ कर 40 लाख हो चुकी है। वे विभिन्न प्रकार के कार्यों में व्यस्त हैं, जिनसे उनकी आमदनी होती है। लेकिन वे ऐसी नागरिक भी बन चुकी हैं जो सामाजिक अन्याय के कई रूपों को चुनौती भी दे रही हैं।

कुडुम्बाश्री का संगठनात्मक ढांचा ही उसे आदर्श बनाता है। यह तीन स्तरीय एकता की सामुदायिक संरचना पर आधारित है। इनमें से पहला 'नेबरहुड ग्रूप' (एनएचजी) है, जिनमें से प्रत्येक में 10-20 महिलाएं होती हैं। एनएचजी को आपस में मिला कर एरिया डेवलपमेंट सोसायटीज (एडीएस) बनती हैं। फिर उनसे मिलकर पंचायत स्तर पर कम्युनिटी डेवलपमेंट सोसायटीज (सीडीएस) का गठन होता है।

कुडुम्बाश्री का अनुभव कुछ महत्वपूर्ण परिणाम लेकर आया है। पहला, इसने औरतों को उनके अलगाव से निकालने में मदद की है।

अलगाव महिला को उससे भी कहीं अधिक नुकसान पहुंचाती है, जितना कि हम समझते हैं। एक अध्ययन में [DS3] जो हमने कोस्टारिका के विमेंस डेवलपमेंट नेटवर्क के साथ किया, मध्य और दक्षिण अमेरिका की महिलाओं ने इसकी पहचान प्राथमिक बाधा के रूप में की। इस नेटवर्क का मोटो है ''हम साथ मिलकर जितना कर सकते हैं उतना अकेले नहीं कर सकते।'' और यह संपर्क, सहकार्यता और एकता की इस जरूरत के लिए आवाज़ बुलंद करता है। औरतें जिस अलगाव का सामना करती हैं, वह कई स्तरों पर हो सकती है, और इसका बहुत ज्यादा आर्थिक प्रभाव हो सकता है। सफल सूक्ष्म उद्यम तैयार करना काफी मुश्किल है, महिलाओं को अपनी सभी घरेलू जिम्मेदारियां निभाते हुए उत्पादन और विपणन के विभिन्न चरणों को खुद ही देखना पड़ता है। लेकिन फिर भी मूल बात यह है कि अलगाव आत्मविश्वास को मजबूती के साथ रोक देता है, जबकि समान महिलाओं के साथ जुड़ने की क्षमता अच्छे प्रभाव पैदा करती है। मेलजोल जमीनी स्तर पर व्यावसायिक गतिविधियों को भी ऊंचा उठाने में मदद करता है, जो अकेले काम करने वाली महिलाएं नहीं कर सकतीं।

कुडुम्बाश्री यही काम पड़ोस की महिलाओं को आपस में एकजुट करके करता है। बहुत सारी महिलाओं के लिए यह उनके घर के बाहर पहली और एकमात्र जगह है। वह अपने जैसी अन्य महिलाओं के साथ मिलती जुलती हैं। और फिर यही काम वार्ड और गांव के स्तर पर आपसी मेलजोल के माध्यम से करती हैं। कुडुम्बाश्री की व्यावसायिक गतिविधियां, मासिक बाजार, खाद्य महोत्सव और अन्य गतिविधियां महिलाओं को विभिन्न अवसर प्रदान करती हैं जो उन्हें कहीं और नहीं मिलते। उनकी वेबसाइट के अनुसार, कैफे कुडुम्बाश्री फूड फेस्ट की हाल ही में समग्र आय 3.22 करोड़ रुपये पहुंच गई, उनके कुल 1434 मासिक बाजारों से 4.51 करोड़ रुपये की कमाई हुई।

दूसरे, कुडुम्बाश्री आय के कई साधन पैदा कर रहा है, जिसके वृहद सामाजिक परिणाम देखने को मिल रहे हैं।

संघ कृषि या सामूहिक खेती ऐसा ही एक साधन है। इस प्रकार के समूहों में अब 200,000 महिलाएं संगठित हो चुकी हैं, जो लगभग सौ हजार एकड़ जमीन पर खेती कर रही हैं। इसकी शुरुआत 2007 में स्थानीय खाद्य उत्पादन बढ़ाने के साधन के रूप में की गई। केरल की महिलाओं ने इस विचार को प्रसन्नतापूर्वक अपना लिया। अब पूरे राज्य में ऐसे 47,000 समूह हैं जिनसे महिला किसान जुड़ चुकी हैं। महिला किसानों के ये समूह बंजर भूमि पट्टे पर लेते हैं, उसे जोत कर तैयार करते हैं, और फिर उसमें खेती करते हैं। उसके बाद ये महिलाएं या तो कृषि-उत्पाद को बेचती हैं या फिर अपने घरों में इस्तेमाल करती हैं, यह सदस्यों की जरूरतों पर निर्भर करता है। इसके उत्साहजनक उदाहरण मौजूद हैं। पेरांबरा में पंचायत के साथ काम करने वाली कुडुम्बाश्री महिलाओं ने 26 वर्षों से बेकार पड़ी 140 एकड़ जमीन को कृषि योग्य बना दिया है। अब वे उस पर चावल, सब्जियां और साबूदाना उगाती हैं।



यह केरल की कृषि में महिलाओं की भूमिका में स्पष्ट बदलाव ला रहा है। हजारों कुडुम्बाश्री महिलाएं कम आय वाली मजदूरी छोड़कर उत्पादक बन रही हैं। स्वतंत्र उत्पादन की वजह से उन्हें अपने समय और मेहनत पर अधिक नियंत्रण प्राप्त हो रहा है। साथ ही फसलों, उत्पादन के तौर-तरीकों और उत्साह पर भी।

लगभग 100,000 महिलाएं अब जैविक खेती कर रही हैं। कई और महिलाएं ऐसा करना चाहती हैं। कुडुम्बाश्री किसान महिलाएं खेती के वैकल्पिक तरीकों को अपनाकर पर्यावरणीय आपदा से लड़ने के लिए भी तैयार हैं।

किसी संगठन से जुड़ने के दूसरे भी लाभ हैं। कुडुम्बाश्री महिलाएं राजनीति में भाग ले रही हैं। वर्ष 2010 में 11,773 ने पंचायत चुनाव में भाग लिया, जिनमें से5,485 जीतने में सफल रहीं।

तेलंगाना के वारंगल जिला में कृषि कामगारों के हाल ही में हुए एक सम्मेलन में, एक के बाद एक वक्ता ने यह कहा कि कृषि कामगार वैसे नहीं होने चाहिए जैसे कि वे अब हैं। उन्हें भूमिहीन नहीं होना चाहिए। उन्हें उत्पादक होना चाहिए, मालिक होना चाहिए। कुडुम्बाश्री महिलाओं ने इस संबंध में अपना रास्ता प्रशस्त कर लिया है। उनके धीरे-धीरे उत्पादक बनने की वजह से 'भूमिहीन मजदूरों' की श्रेणी समाप्त होती जा रही है।

क्यों? इससे उन्हें क्या लाभ मिलता है?

ऐडमालाकुडी में, जहां सौर ऊर्जा के माध्यम से अपने गांव में जो आदिवासी महिलाएं बिजली लेकर आई थीं, वहाँ पर कुडुम्बाश्री नेटवर्क के तहत 40 कम्युनिटी डेवलपमेंट सोसायटीज (सीडीएस) समूह हैं। इनमें से 34 खेती के काम में लगे हुए हैं। उनमें से प्रत्येक महिला मुथावन आदिवासी है। उनमें से प्रत्येक स्वयं को उत्पादक के रूप में देखती हैं और चाहती हैं कि दूसरे भी उन्हें ऐसा ही समझें। ''हम किसी के गुलाम नहीं हैं,'' इस दूरस्थ क्षेत्र में उन्होंने हमसे कहा। ''हम उत्पादक हैं।'' इस ऐतिहासिक परिवर्तन को एक आदमी भौतिक या प्राकृतिक रूप में कैसे नापेगा? मानसिकता में यह परिवर्तन जो खुद उनकी दुनिया को बदल रहा है, भले ही वह उस स्तर पर न हो, जो कि उनके आसपास की दुनिया है, खेद?

किसे तौला नहीं जा सकता

उनके मील के पत्थर संख्या मे काफी असरदार हैं, फिर भी कुडुम्बाश्री महिलाओं की सबसे बड़ी उपलब्धियों को किलोग्राम और एकड़, आय और परिणाम के रूप में नहीं तौला जा सकता।

घर पर बदलने वाली स्थिति को भला संख्या में कैसे मापा जा सकता है? इडुक्की, व्यानंद, थ्रिसुर और ऐसे अन्य कई जिलों की महिलाओं ने हमें बताया कि वे कैसे अब स्वतंत्रता के साथ पैसे कमा रही हैं।

हम इसके महत्व को कैसे नापेंगे: यह भावना कि पहले हम अधिकतर दूसरों पर निर्भर थे, जबकि अब हम पूरी तरह से अपने पैरों पर खड़े हो चुके हैं, स्वतंत्रता से कमा रहे हैं?

बढ़ती राजनीतिक जागरूकता को कोई संख्या में कैसे गिनेगा? या फिर अधिक सार्थक काम से जो संतुष्टि मिलती है उसे कैसे मापा जाएगा? हम महिलाओं की इस स्थिति का अनुमान कैसे लगाएंगे कि अब उन्हें अपने मालिकों से कम खतरा है, कार्यस्थलों पर उनका शोषण भी कम होने लगा है? या फिर यह एहसास कि अब केवल मजदूरी नहीं कमातीं, बल्कि उत्पादक बन चुकी हैं?

क्या कोई लैंगिक न्याय (जेंडर जस्टिस) का वित्तीय मान निकाल सकता है, शायद सबसे बड़ा सकारात्मक पहलू जो कुडुम्बाश्री की महिलाएं सामने लेकर आई हैं?

जैसा कि थिलंगेरी कम्युनिटी डेवलपमेंट सोसायटी की अध्यक्षा, 36 वर्षीय सुबैरा कहती हैं: ''क्या पुरुष और महिलाएं बराबर हैं? बिल्कुल। यह बहस का विषय नहीं है, बल्कि इस पर अमल होना चाहिए।'' सुबैरा को खतरनाक गुर्दे की बीमारी है। वह अपनी मां के साथ रहती हैं जो रोग की वजह से बिस्तर पर हैं। लेकिन सुबैरा की नेतृत्व क्षमता की कोई मिसाल नहीं मिलती। उनके नेतृत्व में उनके गांव ने लगभग शून्य से विकास करते हुए सौ प्रतिशत तक वित्तीय भागीदारी प्राप्त कर ली है।



कई कुडुम्बाश्री महिलाओं को इस बात की खुशी है कि आर्थिक और सामाजिक रूप से सक्रिय होने के बाद उनके बच्चों ने उन्हें अलग तरह से देखना शुरू कर दिया। इससे युवतियों को भी कई सपने देखने में मदद मिल रही है। उदाहरण के रूप में, समीशा पय्योली में दसवीं कक्षा की छात्रा है और अपने गांव में बच्चों की पंचायत अध्यक्षा है। ''मैं पत्रकार बनना चाहती हूँ और अपने समाज की बुराइयों को सामने लाना चाहती हूँ,'' वह कहती है।

हालांकि, कुछ महिलाओं के लिए, इस अभियान में भाग लेना आसान नहीं है। उनके परिवारों और समुदायों द्वारा अक्सर जबरदस्त आपत्ति जताई जाती है। फिर भी महिलाएं ऐसा कर रही हैं, उस चीज के लिए जिसे मापा नहीं जा सकता, कम से कम उस पैमाने से तो बिल्कुल भी नहीं नहीं जो हमारे पास है।

''मैं इस अभियान के साथ इसलिए हूँ क्योंकि इससे मुझे अपने दर्द को शक्ति में बदलने में मदद मिलती है,'' कुडुम्बाश्री की एक सदस्य उस समय बयान करती है जब वह अपने काम को जारी रखने के दौरान खुद पर बीती परेशानियों के बारे में बता रही होती है।

क्या हम यह भी नाप सकते हैं कि कुडुम्बाश्री की संघ कृषि का क्या महत्व है? इसने महिलाओं को खाद्य उत्पादन पर नियंत्रण दिया है, जो कि खाद्य सुरक्षा का आधार है।

देसी महिलाएं हर जगह सतत विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। चाहे कार्पोरेटाइजेशन या कमर्शियल लैंड डेवलपमेंट के विरोध की बात हो, या फिर स्थायी कृषि का पालन करने की बात। संघ कृषि इस भूमिका को मजबूत करने में मदद कर रही है।

बंजर भूमि को धान के खेत में बदल देने के महत्व का अनुमान कैसे लगाया जा सकता है, एक ऐसे देश में जहां बड़े पैमाने पर खाद्य फसलों वाले खेत तेजी से नकदी फसलों वाले खेत में परिवर्तित किये जा रहे हैं?

कुडुम्बाश्री की 'ग्रीन आर्मी' ने यही किया है।

क्या कोई इसकी कीमत या आर्थिक मान निकाल सकता है कि संघ कृषि द्वारा भूमि को कृषि योग्य बनाने के बाद प्रवासी पक्षी लौटने लगे हैं? क्या यह मापा जा सकता है?

इस परिवर्तन के सामाजिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक महत्व का अनुमान कोई कैसे निकाल सकता है?

दिमाग के सीखने की तरफ झुकाने को कोई कैसे नाप सकता है? केवल उच्च सामग्री उत्पादन के बारे में ही नहीं, बल्कि जिसके माध्यम से महिलाएं अपने घरेलू अधिकारों को तेजी से समझ रही हैं और उन पर अमल कर रही हैं? यह छोटी राजनीति है जिसका बड़ा परिणाम सामने आ रहा है। ये महिला सदस्य अक्सर मजबूती के साथ राजनीति से जुड़ी होती हैं लेकिन समूह की बैठकों में इसे हावी नहीं होने देतीं।

केवल भूमि-सुधार के आंदोलन अधिक प्रभावी थे, ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण थे। लेकिन कुडुम्बाश्री महिलाएं एक और तत्व लेकर आई हैं जो उनमें नहीं था, यानी लैंगिक न्याय। तो हम इसे कैसे नापेंगे? यह एकड़ या किलो में नहीं परिवर्तित होता। और हम लैंगिक न्याय और सामूहिक भावना के इन विचारों को कैसे व्यावहारिक करेंगे, क्योंकि यह एक वास्तविक चुनौती है, 'विकास' और 'गरीबी उन्मूलन' के अपने तरीके पर अमल करते हुए?

यह लेख पहले  Yahoo India Originals पर प्रकाशित हुआ था।

डॉ. मोहम्मद क़मर तबरेज़ दिल्ली में स्थित पत्रकार हैं, जो राष्ट्रीय सहारा, चौथी दुनिया और अवधनामा जैसे अख़बारों से जुड़े रहे हैं और इस समय उर्दू दैनिक रोज़नामा मेरा वतन के न्यूज़ एडीटर हैं। उन्होंने समाचार एजेंसी एएनआई के साथ भी काम किया है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातक और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पीएचडी की डिग्री प्राप्त करने वाले तबरेज़ अब तक दो किताबें और सैंकड़ों लेख लिखने के अलावा कई पुस्तकों के अंग्रेज़ी से हिंदी और उर्दू में अनुवाद कर चुके हैं। You can contact the translator here:

P. Sainath & Ananya Mukherjee

पी. साईनाथ People's Archive of Rural India के फाउंडर-एडिटर हैं। वह दशकों से ग्रामीण भारत के पत्रकार रहे हैं और वह 'Everybody Loves a Good Drought' के लेखक भी हैं। अनन्या मुखर्जी यॉर्क विश्वविद्यालय, टोरंटो में राजनीतिक विज्ञान की प्रोफेसर हैं। अनन्या सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद कनाडा (एसएसएचआरसी) और शास्त्री इंडो-कनाडियन इंस्टीट्यूट की आभारी हैं कि उन्होंने इस लेख में मौजूद सूचनाओं के रिसर्च में मदद की। वह इस बात को भी स्वीकार करती हैं कि इस शोध के एक भाग को दूसरे रूप में पहले द हिंदू में प्रकाशित किया जा चुका है।

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