“सुबह के 11 बज कर 40 मिनट हो चुके हैं, इसलिए आगे गति की ताज़ा स्थिति के बारे में बताया जा रहा है,” कडल ओसई रेडियो स्टेशन पर ए यशवंत घोषणा करते हैं। “पिछले एक सप्ताह या एक महीने से, कचान काथू [दक्षिणी हवा] बहुत तीव्र थी। उसकी गति 40 से 60 [किलोमीटर प्रति घंटा] थी। आज, मानो मछुआरों की मदद करने के लिए, यह कम होकर 15 [किमी प्रति घंटा] पर पहुंच गई है।”

तमिलनाडु के रामनाथपुरम जिले के पाम्बन द्वीप के मछुआरों के लिए यह बहुत अच्छी खबर है। “इसका मतलब है कि वे बिना किसी डर के समुद्र में जा सकते हैं,” यशवंत बताते हैं जो खुद एक मछुआरे हैं। वह इस इलाके में रहने वाले समुदाय के एक रेडियो स्टेशन, कडल ओसई (समुद्र की आवाज़) में रेडियो जॉकी भी हैं।

रक्तदान पर एक विशेष प्रसारण शुरू करने के लिए, यशवंत मौसम की रिपोर्ट से संबंधित अपनी बात इन शब्दों के साथ खत्म करते हैं: “तापमान 32 डिग्री सेल्सियस पर पहुंच चुका है। इसलिए पर्याप्त मात्रा में पानी पीते रहें और धूप में न जाएं।”

यह एक आवश्यक सावधानी है, क्योंकि पाम्बन में अब 1996 के मुकाबले, जिस साल यशवंत का जन्म हुआ था, कहीं ज़्यादा गर्म दिन देखने को मिल रहे हैं। तब, इस द्वीप पर एक साल में कम से कम 162 दिन ऐसे होते थे जब तापमान 32 डिग्री सेल्सियस के निशान को छू लेता था या उसके पार पहुंच जाता था। उनके पिता एंथोनी सामी वास – जो अभी भी एक पूर्णकालिक मछुआरे हैं – जब 1973 में पैदा हुए थे, तो इतनी गर्मी साल में 125 दिन से ज़्यादा नहीं पड़ती थी। लेकिन आज, उन गर्म दिनों की संख्या सालाना कम से कम 180 हो चुकी है, यह कहना है जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग पर एक इंटरैक्टिव उपकरण से की गई गणना का, जिसे न्यूयॉर्क टाइम्स द्वारा इस साल जुलाई में ऑनलाइन पोस्ट किया गया था।

इसलिए यशवंत और उनके सहयोगी न केवल मौसम को, बल्कि जलवायु के बड़े मुद्दे को भी समझने की कोशिश कर रहे हैं। उनके पिता और अन्य मछुआरे – जिनकी वास्तविक संख्या इस द्वीप के दो मुख्य शहर, पाम्बन और रामेश्वरम में 83,000 के करीब है – उनकी ओर इस उम्मीद से देख रहे हैं कि वे इन परिवर्तनों का सही मतलब समझाएंगे।

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रेडियो जॉकी यशवंत, अपने पिता एंथोनी सामी और अपनी नाव (दाएं) के साथ: बाहर निकलने से पहले हम हवाओं और मौसम का अंदाज़ा लगाया करते थे। लेकिन आज, हमार कोई भी अंदाज़ा सटीक नहीं बैठता

“मैं 10 साल की उम्र से मछली पकड़ रहा हूं,” एंथोनी सामी कहते हैं। “समुद्रों में निश्चित रूप से [तब से] भारी परिवर्तन हुआ है। पहले, बाहर निकलने से पहले हम हवाओं और मौसम का अंदाज़ा लगाया करते थे। लेकिन आज, हमारा कोई भी अंदाज़ा सटीक नहीं बैठता। इतने भयंकर बदलाव हुए हैं कि वे हमारे ज्ञान को गलत साबित कर देते हैं। पहले, समुद्र में जाते समय इतनी गर्मी कभी नहीं होती थी। लेकिन आज, गर्मी हमारे लिए बहुत ज़्यादा कठिनाइयां पैदा कर रही है।”

कभी-कभी, सामी जिस समुद्र की बात कर रहे हैं, वह घातक हो जाता है। जैसा कि इस साल 4 जुलाई को हुआ था जब यशवंत - जो अपने पिता की नाव पर जब भी मौका मिलता है, मछली पकड़ने जाते हैं – रात में 9 बजे के बाद यह ख़बर लेकर आए कि समुद्र में ख़राब मौसम के कारण चार लोग अपना रास्ता भटक गए। उस समय कडल ओसई बंद हो चुका था – इसका प्रसारण सुबह 7 बजे से शाम 6 बजे तक होता है – लेकिन आरजे (रेडियो जॉकी) होने की वजह से वह रेडियो पर आए और घोषणा की कि कुछ मछुआरे संकट में फंसे हुए हैं। “हमारे पास इस परिसर में हमेशा एक आरजे होता है, भले ही यह आधिकारिक तौर पर बंद हो।” रेडियो स्टेशन की प्रमुख, गायत्री उस्मान कहती हैं। और अन्य कर्मचारी आसपास ही रहते हैं। “इसलिए आपात स्थिति में हम हमेशा प्रसारण कर सकते हैं।” उस दिन, कडल ओसई के कर्मचारियों ने पुलिस, तट रक्षक, जनता और अन्य मछुआरों को सतर्क करने के लिए अविश्वसनीय तरीके से काम किया।

बाद में कई रात जागते रहने के बाद, केवल दो लोगों को बचाया जा सका। “वे क्षतिग्रस्त वल्लम [देसी नाव] से लटके हुए थे। अन्य दो ने हाथ में दर्द होने की वजह से, बीच में ही नाव छोड़ दी,” गायत्री कहती हैं। विदा होते समय उन्होंने अपने दोनों साथियों से कहा कि वे प्यार का संदेश उनके परिवारों तक पहुंचा दें और उन्हें समझा दें कि वे ज़्यादा देर तक नाव को पकड़े नहीं रह सके। उनके शव 10 जुलाई को समुद्र के किनारे पड़े मिले।

“अब हालात पहले जैसे नहीं रहे,” 54 वर्षीय एके सेसुराज या ‘कैप्टन राज’ कहते हैं, जिन्होंने यह उपाधि अपनी नाव के नाम की वजह से अर्जित की है। वह बताते हैं कि नौ साल की उम्र में जब उन्होंने समुद्र में जाना शुरू किया था तो उस समय “इसका स्वभाव मित्रतापूर्ण था। हमें पता रहता था कि मछली कितनी मिलेगी और मौसम कैसा रहेगा। आज, दोनों के बारे में अनुमान लगाना मुश्किल है।”

वीडियो देखें: कैप्टन राज अंबा गीत सुना रहे हैं

‘अब हालात पहले जैसे नहीं रहे’, 54 वर्षीय एके सेसुराज या ‘कैप्टन राज’ कहते हैं। वह बताते हैं कि ‘समुद्र का स्वभाव मित्रतापूर्ण था...हमें पता रहता था कि मछली कितनी मिलेगी और मौसम कैसा रहेगा। आज, दोनों के बारे में अनुमान लगाना मुश्किल है’

राज इन परिवर्तनों से असमंजस में हैं, लेकिन कडल ओसई के पास, निष्पक्ष रहने पर, उनके लिए कुछ जवाब हैं। गैर सरकारी संगठन, नेसक्करंगल द्वारा 15 अगस्त 2016 को लॉन्च किए जाने के बाद से ही यह स्टेशन समुद्र, मौसम के उतार-चढ़ाव तथा जलवायु परिवर्तन पर कार्यक्रम चलाता आ रहा है।

कडल ओसई एक दैनिक कार्यक्रम चलाता है, जिसका नाम है समुथिरम पळगु (समुद्र को जानें),” गायत्री कहती हैं। “इसका उद्देश्य समुद्रों का संरक्षण है। हम जानते हैं कि इससे जुड़े बड़े मुद्दे समुदाय पर दीर्घकालिक प्रभाव डालेंगे। समुथिरम पळगु जलवायु परिवर्तन पर बातचीत को जारी रखने की हमारी एक कोशिश है। हम समुद्री स्वास्थ्य के लिए हानिकारक क्रियाकलापों और उनसे बचने के बारे में बात करते हैं [उदाहरण के लिए, नावों द्वारा हद से ज़्यादा मछली पकड़ना, या डीज़ल और पेट्रोल पानी को कैसे प्रदूषित कर रहे हैं]। कार्यक्रम के दौरान हमारे पास लोगों के फ़ोन आते हैं, जो खुद अपने अनुभव साझा करते हैं। कभी-कभी, वे अपनी गलतियों के बारे में बताते हैं – और वादा करते हैं कि वे उन्हें दोहराएंगे नहीं।”

“अपनी शुरूआत से ही, कडल ओसई की टीम हमारे संपर्क में है,” क्रिस्टी लीमा कहती हैं, जो एमएस स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन (MSSRF), चेन्नई में संचार प्रबंधक हैं, यह संस्था इस रेडियो स्टेशन की सहायता करती है। “वे अपने कार्यक्रमों में हमारे विशेषज्ञों को बुलाते रहते हैं। लेकिन मई से, हमने जलवायु परिवर्तन के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए भी उनके साथ काम किया है। कडल ओसई के माध्यम से ऐसा करना आसान है, क्योंकि कम्युनिटी रेडियो के रूप में वे पाम्बन में पहले से ही काफ़ी लोकप्रिय हैं।”

इस रेडियो स्टेशन ने कडल ओरु अदिसयम, अदई कापदु नम अवसियम (समुद्र एक अजूबा है, हमें इसकी रक्षा करनी चाहिए) शीर्षक से, मई और जून में विशेष रूप से जलवायु परिवर्तन के मुद्दों पर चार एपिसोड प्रसारित किए। MSSRF की तटीय प्रणाली अनुसंधान इकाई के विशेषज्ञ, इसके अध्यक्ष वी सेल्वम के नेतृत्व में इन एपिसोड में शामिल हुए। “ऐसे कार्यक्रम बेहद महत्वपूर्ण हैं क्योंकि जब हम जलवायु परिवर्तन के बारे में बात करते हैं, तो हम शीर्ष पर जाकर या विशेषज्ञों के स्तर पर ऐसा करते हैं,” सेल्वम का कहना है। “इसके बारे में ज़मीनी स्तर पर चर्चा करने की आवश्यकता है, उन लोगों के बीच जाकर जो वास्तव में दिन-प्रतिदिन के आधार पर इसके प्रभावों को झेल रहे हैं।”

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बाएं: पाम्बन मार्ग पर कडल ओसई का कार्यालय, जहां भारी मात्रा में मछली का कारोबार होता है। दाएं: स्टेशन के 11 कर्मचारियों में से एक, डी रेडिमार जो आज भी समुद्र में जाते हैं

10 मई को प्रसारित एक एपिसोड ने पाम्बन के लोगों को अपने द्वीप पर हो रहे बड़े बदलाव को बेहतर ढंग से समझने में मदद की। दो दशक पहले तक, कम से कम 100 परिवार 2,065 मीटर लंबे पाम्बन पुल के करीब रहते थे, जो रामेश्वरम शहर को भारत की मुख्य भूमि से जोड़ता है। लेकिन समुद्र के बढ़ते स्तर ने उन्हें इस जगह को छोड़ दूसरे स्थानों पर जाने के लिए मजबूर किया। एपिसोड में, सेल्वम श्रोताओं को समझाते हैं कि जलवायु परिवर्तन इस प्रकार के विस्थापन में कैसे तेज़ी ला रहा है।

ना तो विशेषज्ञों या मछुआरों ने इस मुद्दे को सरल बनाने का प्रयास किया और ना ही स्टेशन के संवाददाताओं ने। वे इन परिवर्तनों के लिए ज़िम्मेदार कोई एक घटना या कोई एक कारण बयान करने में भी नाकाम रहे। लेकिन वे इस संकट को फैलाने में मानव गतिविधि की भूमिका की ओर ज़रूर इशारा करते हैं। कडल ओसई की कोशश है कि वह इन सवालों का जवाब ढूंढने में इस समुदाय का नेतृत्व करे, उन्हें खोज की दुनिया में ले जाए।

“पाम्बन एक द्वीप पारितंत्र है और इसीलिए ज़्यादा असुरक्षित है,” सेल्वम कहते हैं। “लेकिन रेत के टीलों की उपस्थिति द्वीप को जलवायु के कुछ प्रभावों से बचाती है। इसके अलावा, यह द्वीप श्रीलंकाई तट के चक्रवातों से कुछ हद तक सुरक्षित है,” वह बताते हैं।

लेकिन समुद्री धन की हानि वास्तविक बनी हुई है, जिसके पीछे जलवायु तथा गैर-जलवायु कारकों का हाथ है, वह आगे कहते हैं। मुख्य रूप से नावों द्वारा हद से ज़्यादा मछलियां पकड़ने के कारण अब शिकार में कमी आ चुकी है। समुद्र के गर्म होने से मछलियां अब समूहों में नज़र नहीं आतीं।

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बाएं: एम सैलास उन महिलाओं का इंटरव्यू ले रही हैं, जो उन्हीं की तरह, पाम्बन द्वीप के मछुआरा समुदाय से हैं। दाएं: रेडियो स्टेशन की प्रमुख, गायत्री उस्मान सामुदायिक मंच के लिए एक स्पष्ट दिशा लेकर आई हैं

ऊरल, सिरा, वेलकंबन... जैसी प्रजातियां पूरी तरह से लुप्त हो चुकी हैं,” मछुआरा समुदाय से आने वाली तथा कडल ओसई की आरजे, बी मधुमिता ने 24 मई को प्रसारित एक एपिसोड में बताया। “पाल सुरा, कलवेती, कोंबन सुरा जैसी कुछ प्रजातियां अभी भी मौजूद हैं, लेकिन उनकी संख्या बहुत कम है। हैरानी की बात यह है कि केरल में किसी ज़माने में बहुतायत में पाई जाने वाली माथी मछली, अब हमारी तरफ़ भारी संख्या में मौजूद है।”

उसी एपिसोड में एक अन्य बुज़ुर्ग महिला, लीना (जिनका पूरा नाम उपलब्ध नहीं है) कहती हैं कि एक अन्य प्रजाति, मन्डईकलगु, जो लगभग दो दशक पहले यहां टनों में उपलब्ध हुआ करती थी, अब गायब हो चुकी है। वह बताती हैं कि कैसे उनकी पीढ़ी ने उस मछली का मुंह खोल कर उसके अंडे निकाले और खा गए। यह एक ऐसी अवधारणा है जिसे एम सैलास जैसी कम उम्र की महिलाएं, जो खुद उसी समुदाय से हैं (और एक पूर्णकालिक कडल ओसई एंकर तथा निर्माता हैं, जिनके पास एमकॉम की डिग्री है), ठीक से समझ नहीं सकतीं।

“1980 के दशक तक, हम टनों कट्टई, सीला, कोंबन सुरा और इस प्रकार की अन्य प्रजातियां प्राप्त किया करते थे,” लीना कहती हैं। “आज हम उन मछलियों को डिस्कवरी चैनल पर तलाश कर रहे हैं। मेरे दादा-परदादा [जिन्होंने गैर-मशीनीकृत देसी नावों का इस्तेमाल किया] कहा करते कि इंजन की आवाज़ मछलियों को दूर भगा देती है। और पेट्रोल या डीज़ल ने पानी में ज़हर घोल दिया और मछलियों के स्वाद को बदल दिया।” वह याद करते हुए बताती हैं कि उन दिनों महिलाएं भी समुद्र के किनारे पानी में उतर जातीं और जाल फेंक कर मछली पकड़ लिया करती थीं। अब चूंकि किनारे पर मछलियां नहीं मिलतीं, इसलिए महिलाओं ने भी समुद्र में जाना कम कर दिया है।

17 मई के एक एपिसोड में मछली पकड़ने के पारंपरिक तरीके और नई तकनीकों पर चर्चा की गई - और समुद्री जीवन को संरक्षित करने के लिए दोनों को कैसे संयोजित किया जाए। “मछुआरों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जाता है कि वे तटों पर पिंजरे डालें और मछलियों का प्रजनन करें। सरकार इस ‘पिंजरा कल्चर’ का समर्थन कर रही है, क्योंकि यह खत्म होती समुद्री संपदा के मुद्दे को संबोधित करता है,” गायत्री कहती हैं।

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मछुआरों के हितों की गूंज

पाम्बन के 28 वर्षीय मछुआरे, एंटनी इनिगो इसे आज़माने के इच्छुक हैं। “पहले, अगर ड्यूगांग (एक समुद्री स्तनपायी) हमारे हाथ लग जाते, तो हम उन्हें समुद्र में वापस नहीं छोड़ते थे। लेकिन कडल ओसाई पर प्रसारित एक कार्यक्रम को सुनने के बाद हमें पता चला कि जलवायु परिवर्तन और मानव क्रिया ने उन्हें कैसे विलुप्त होने के कगार पर पहुंचा दिया है। हम उन्हें समुद्र में वापस छोड़ने के लिए अपने महंगे जालों को काटने के लिए तैयार हैं। कछुओं के साथ भी हम ऐसा ही करते हैं।”

“अगर हमारे पास आकर कोई विशेषज्ञ यह बताता है कि जलवायु परिवर्तन मछलियों को कैसे प्रभावित कर रहा है, तो वहीं हमसे कुछ ऐसे मछुआरे भी जुड़ जाते हैं जो अपने अनुभव से बताते हैं कि इस बात में कितनी सच्चाई है,” गायत्री कहती हैं।

“मछलियों के गायब होने का दोषी हमने देवताओं और प्रकृति को ठहराया। अपने शो के माध्यम से हमने महसूस किया है कि यह पूरी तरह से हमारी गलती है,” सैलास कहती हैं। कडल ओसई के सभी कर्मचारी, उन्हीं की तरह मछुआरा समुदाय से हैं - गायत्री को छोड़कर। वह एक योग्य साउंड इंजीनियर हैं, जो डेढ़ साल पहले उनके साथ शामिल हुई थीं और इस सामुदायिक मंच के लिए एक स्पष्ट दिशा और उद्देश्य लेकर आईं।

कडल ओसई का अवर्णित कार्यालय पाम्बन मार्ग पर स्थित है जहां अधिकतर दिन मछलियों का भारी व्यापार होता है। बोर्ड पर नीले रंग से इसका नाम लिखा है- नमदु मुन्नेट्रतुक्कान वानोली (हमारे विकास का रेडियो)। कार्यालय के अंदर आधुनिक रिकॉर्डिंग स्टूडियो के साथ एफएम स्टेशन है। उनके पास बच्चों, महिलाओं तथा मछुआरों के लिए अलग-अलग कार्यक्रम हैं - और बीच-बीच में वे समुद्र में जाने वाले मछुआरों के लिए अंबा गाने बजाते रहते हैं। रेडियो स्टेशन के कुल 11 कर्मचारियों में से केवल यशवंत और डी. रेडिमर अभी भी समुद्र में जाते हैं।

यशवंत का परिवार कई साल पहले तूतुकुडी से पाम्बन आ गया था। “वहां पर मत्स्य पालन फायदे का सौदा नहीं रह गया था,” वह बताते हैं। “मेरे पिता के लिए प्रचुर मात्रा में मछलियां पकड़ना मुश्किल हो रहा था।” रामेश्वरम अपेक्षाकृत बेहतर था, लेकिन “कुछ वर्षों के बाद, यहां भी मछलियां कम होने लगीं।” कडल ओसई ने उन्हें महसूस कराया कि यह “दूसरों के द्वारा किए गए ‘काले जादू’ का नतीजा नहीं है, बल्कि शायद उस ‘काले जादू’ का नतीजा है जो खुद हमने इस वातावरण पर किया है।”

वह लाभ को लेकर लोगों की सनक के बारे में चिंतित हैं। “कुछ बुज़ुर्गों का अभी भी यह मानना है कि वे इसलिए ग़रीब हैं क्योंकि उनके पूर्वजों ने मछलियां पकड़ने के मामले में ज़्यादा कुछ नहीं किया। वे ज़्यादा से ज़्यादा लाभ कमाने की कोशिश करते हैं, जिससे समुद्र का अधिक दोहन हो रहा है। हममें से कुछ युवा अब इसके खतरों को समझते हैं, इसलिए हम उस ‘काले जादू’ को खत्म करने की कोशिश कर रहे हैं।”

वह लाभ को लेकर लोगों की सनक के बारे में चिंतित हैं। ‘कुछ बुज़ुर्गों का अभी भी यह मानना है कि वे इसलिए ग़रीब हैं क्योंकि उनके पूर्वजों ने मछलियां पकड़ने के मामले में ज़्यादा कुछ नहीं किया…वे ज़्यादा से ज़्यादा लाभ कमाने की कोशिश करते हैं, जिससे समुद्र का अधिक दोहन हो रहा है’

वीडियो देखें: आरजे यशवंत पाम्बन को मौसम की सूचना दे रहे हैं

फिर भी, इस वृहद समुदाय का पारंपरिक ज्ञान सीखने का एक समृद्ध स्रोत बना हुआ है। “विशेषज्ञ अक्सर यही तो करते हैं। वे उस ज्ञान को प्रमाणित करते हैं और याद दिलाते हैं कि हमें इसे क्यों इस्तेमाल करना चाहिए। हमारा रेडियो स्टेशन पारंपरिक ज्ञान को एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान करता है। बदले में, हमारा समुदाय हमारे प्रसारण पर दी गई विशेषज्ञता का उपयोग करता है,” मधुमिता कहती हैं।

पाम्बन नाविक संघ (Pamban Country Boats Fishermen’s Association) के अध्यक्ष, एसपी रायप्पन इससे सहमत हैं। “हमने समुद्री जीवन का हद से ज़्यादा दोहन और इसके खतरों के बारे में हमेशा बात की है। कडल ओसई द्वारा मछुआरों के बीच फैलाई गई जागरूकता ज़्यादा प्रभावशाली है, हमारे लोग अब ड्यूगांग या कछुए को बचाने के लिए कभी-कभी इंपोर्टेड जाल भी त्याग देते हैं।” और सैलास तथा मधुमिता को उम्मीद है कि उनका रेडियो स्टेशन, शायद एक दिन मन्डईकलगु को भी द्वीप के पानियों में वापस लाने में मदद करेगा।

अधिकांश सामुदायिक रेडियो स्टेशनों की तरह ही, इसका प्रसारण भी 15 किलोमीटर से ज़्यादा दूर नहीं पहुंचता है। लेकिन पाम्बन में लोगों ने कडल ओसई को गले लगा लिया है – “और हमें श्रोताओं से एक दिन में दस पत्र मिलते हैं,” गायत्री का कहना है। “हमने जब शुरुआत की थी, तो लोगों को आश्चर्य हुआ था कि हम कौन हैं और किस विकास की बात कर रहे हैं। अब वे हम पर भरोसा करते हैं।”

यह केवल जलवायु है जिसमें वे अपना विश्वास खो रहे हैं।

कवर फोटो: पाम्बन में 8 जून को संयुक्त राष्ट्र के विश्व महासागरीय दिवस समारोह में बच्चों के हाथ में एक बोर्ड है, जिस पर लिखा है कडल ओसई (फोटो: कडल ओसई)

जलवायु परिवर्तन पर PARI की राष्ट्रव्यापी रिपोर्टिंग, आम लोगों की आवाज़ों और जीवन के अनुभव के माध्यम से उस घटना को रिकॉर्ड करने के लिए UNDP-समर्थित पहल का एक हिस्सा है।

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हिंदी अनुवाद: मोहम्मद क़मर तबरेज़

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मोहम्मद क़मर तबरेज़ 2015 से ‘पारी’ के उर्दू/हिंदी अनुवादक हैं। वह दिल्ली स्थित एक पत्रकार, दो पुस्तकों के लेखक, उर्दू समाचारपत्र ‘रोज़नामा मेरा वतन’ के न्यूज़ एडिटर हैं, और ‘राष्ट्रीय सहारा’, ‘चौथी दुनिया’ तथा ‘अवधनामा’ जैसे अख़बारों से जुड़े रहे हैं। उनके पास अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातक तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली से पीएचडी की डिग्री है। You can contact the translator here:

Kavitha Muralidharan

कविता मुरलीधरन चेन्नई स्थित एक स्वतंत्र पत्रकार और अनुवादक हैं। वह पहले ‘इंडिया टुडे’ (तमिल) की संपादक थीं और उससे पहले ‘द हिंदू’ (तमिल) के रिपोर्टिंग सेक्शन की अगुवाई करती थीं। वह पारी की स्वयंसेविका (PARI volunteer) हैं।

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